यूक्रेन में तबाही का 8वां दिन, 5 स्थितियों में जानें आखिर कब तक चल सकता है रूसी आक्रमण
मॉस्को. धमाकों की गूंज, तबाह होते भवन, सड़कों पर गोलीबारी के बीच निकलते सैन्य वाहनों और कभी नागरिकों से पटी सड़कों पर बंदूकधारी घूमते नजर आ रहे हैं. रूस और यूक्रेन (Russia-Ukraine) के बीच जारी युद्ध में शहरों का नजारा यही है. सैकड़ों आम लोगों और सैनिकों की मौत की जिम्मेदार बनी इस जंग को लेकर जानकार कई कारण गिनाते हैं. रूस की तरफ से शुरू किए गए आक्रमण को एक सप्ताह से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है, लेकिन यह संघर्ष कब तक चलेगा अभी साफ नहीं है.
भाषा के अनुसार, यूक्रेन और रूस के वार्ताकारों ने गुरुवार को कहा कि युद्ध पर तीसरे दौर की वार्ता जल्द ही होगी. पोलैंड की सीमा के समीप बेलारूस में गुरुवार को वार्ता में रूसी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सलाहकार व्लादिमीर मेदिन्स्की ने कहा कि दोनों पक्षों की ‘स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है, संघर्ष के राजनीतिक समाधान से संबंधित मुद्दों समेत एक-एक बात लिखी गयी है.’ उन्होंने विस्तार से जानकारी दिए बिना कहा, ‘उनकी ओर से आपसी सहमति बनी है.’
दोनों देशों के बीच के हालात को इन 5 तरह से देखा जा जाए, तो समयसीमा का अनुमान लगाया जा सकता है-
शॉर्ट वॉर या कम अवधि का युद्ध
बीबीसी के अनुसार, इसके तहत रूस अपनी सैन्य कार्रवाई को तेज करेगा. पूरे यूक्रेन में रॉकेट से हमले जारी हैं. इसी बीच अभी तक किसी बड़ी भूमिका से वंचित रही रूसी वायुसेना भी एयर स्ट्राइक के जरिए गतिविधियां तेज कर सकती हैं. साथ ही एनर्जी सप्लाई और संचार के रास्ते खत्म कर दिए गए, हजारों आम नागरिक मर जाते हैं. बहादुरी से सुरक्षा के बजाए कीव कुछ ही दिनों में रूस के हाथों गिर जाए और देश में मॉस्को समर्थित एक कठपुतली सरकार आ जाए. साथ ही राष्ट्रपति जेलेंस्की को या तो खत्म कर दिया जाए, या वे निर्वासित सरकार स्थापित करने के लिए यूक्रेन या विदेश भाग जाएं. इसके बाद राष्ट्रपति पुतिन जीत की घोषणा कर दें और कुछ सैनिकों को वापस बुला लें. हजारों शरणार्थियों का पश्चिम की ओर भागना जारी है और यूक्रेन, मॉस्को के क्लाइंट स्टेट के रूप में बेलारूस के साथ शामिल हो जाए. हालांकि, यह स्थिति असंभव नहीं है, लेकिन कई पुतिन और यूक्रेन के प्रदर्शन समेत कई बातों पर निर्भर करती है.
लॉन्ग वॉर या लंबी अवधि का युद्ध
मौजूदा जंग के लंबे चलने की संभावना जताई जा रही है. हो सकता है कि इस दौरान मनोबल टूटने, रसद पहुंचने में परेशानी और कमजोर नेतृत्व के चलते रूसी सेना कमजोर पड़ जाए. हो सकता है कि उन्हें कीव जैसे शहरों पर नियंत्रण हासिल करने में लंबा समय लग जाए. इसके बाद अगर रूसी सेना यूक्रेन के शहरों में पहुंच भी जाती हैं, तो हो सकता है कि उन्हें नियंत्रण बनाए रखना मुश्किल हो जाए. हो सकता है कि रूस इतने बड़े देश को कवर करने के लिए पर्याप्त सैनिक न भेज पाए.
इस दौरान स्थानीय लोगों के समर्थन से यूक्रेन के बलों की तरफ से विद्रोह शुरू हो जाए. वहीं, पश्चिम की तरफ से देश को हथियार की आपूर्ति जारी रहे. इसके बाद हो सकता है कि कई सालों में शायद मॉस्को में नई सरकार आने के बाद रूसी सैना यूक्रेन छोड़ दे.
यूरोपीय युद्ध
सवाल है कि क्या इस युद्ध के यूक्रेन की सीमा के बाहर फैलने की संभावनाएं हैं या नहीं? राष्ट्रपति पुतिन रूस के पूर्व साम्राज्य के कुछ हिस्सों में ताकत हासिल करने के लिए मोल्डोवा और जॉर्जिया जैसी जगहों पर में सेना भेज सकते हैं, जो नाटो का हिस्सा नहीं है. पुतिन यूक्रेन को पश्चिम देशों से मिल रहे हथियारों की आपूर्ति को आक्रामकता बताकर जवाबी कार्रवाई की बात कर सकते हैं. वे कलीनिनग्राड के रूसी तटीय क्षेत्र के साथ लैंड कॉरिडोर या भूमि गलियारा बनाने के लिए लिथुआनिया जैसे नाटो के सदस्य बाल्टिक देशों में सेना भेज सकते हैं.
हालांकि, यह काफी खतरनाक होगा और इसमें नाटो के साथ युद्ध का जोखिम भी है. सैन्य गठबंधन के चार्टर के अनुच्छेद 5 के तहत किसी एक सदस्य पर हमला सभी पर हमले के बराबर है. लेकिन अगर पुतिन को लगता है कि यह उनके नेतृत्व को बचाने का एकमात्र तरीका है, तो वे यह जोखिम ले सकते हैं. अगर वे यूक्रेन में हार का सामना करें, तो गतिविधियां बढ़ाने के बारे में सोच सकते हैं.
कूटनीति से समाधान
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, ‘फिलहाल, बंदूकें बात कर रही हैं, लेकिन वार्ता का रास्ता हमेशा खुला रहना चाहिए.’ इधर, फ्रांस के राष्ट्रपति एमेनुएल मैक्रॉ ने भी पुतिन से फोन पर बात की है. हालांकि, इससे कोई खास फायदा नहीं मिला, लेकिन बातचीत के लिए राजी होकर पुतिन ने युद्धविराम की संभावनाओं से इनकार नहीं किया है.
अहम सवाल यह है कि क्या पश्चिम रूस को वह चीज दे सकता है, जिसे राजनयिक ‘ऑफ रैंप’ (वह रैंप जिसके जरिए कोई व्यक्ति वन वे रोड से बड़े हाईवे की तरफ जाता है) मानते हैं. राजनयिकों का मानना है कि यह जरूरी है कि रूसी नेता को पता हो कि पश्चिम की तरफ से लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने के लिए क्या करना होगा.
अगर इस स्थिति को देखें, तो चीजे रूस के लिए काफी खराब नजर आती हैं. प्रतिबंधों के चलते मॉस्को अस्थिर हो रहा है. शवों के घर पहुंचने पर विपक्ष भी मजबूती से विरोध कर रहा है. पुतिन भी सोच रहे हैं कि उन्होंने वादा पूरा किया या नहीं. उन्हें लगता है कि युद्ध को खत्म करने पर शर्मिंदगी की तुलना में युद्ध को जारी रखना उनके नेतृत्व के लिए ज्यादा बड़ा जोखिम हो सकता है. इधर, चीन भी मॉस्को पर रूसी गैस और तेल नहीं खरीदने की चेतावनी देते हुए समझौते का दवाब डाले. हालांकि, यूक्रेन के अधिकारयों का मानना है कि देश के बड़े नुकसान से बेहतर सियासी समझौता है.
सत्ता से बाहर हो जाएं पुतिन
आक्रमण की शुरुआत में पुतिन ने कहा था कि वे किसी परिणाम के लिए तैयार हैं. लेकिन क्या होगा अगर परिणाम में वे सत्ता गंवा दें? बीबीसी के अननसार, लंदन के किंग्स कॉलेज के प्रोफेसर सर लॉरेंस फ्रीडमैन ने इस सप्ताह लिखा, ‘अब इस बात की संभावनाएं ज्यादा हैं कि कीव के साथ मॉस्को में भी शासन बदलेगा.’ अब सवाल उठता है कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों कहा?
हो सकता है कि पुतिन हमला जारी रखें, हजारों रूसी सैनिकों की मौत हो जाए, अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचे और पुतिन समर्थन खो दें. यहां शायद क्रांति का खतरा भी बना हुआ है. वे विरोध को दबाने के लिए रूस के आंतरिक सुरक्षा बलों की मदद लें, लेकिन इसका परिणाम यह हो कि रूस के सैन्य, राजनीतिक और अमीर पुतिन के खिलाफ हो जाएं. पश्चिम ने यह साफ कर दिया है कि अगर पुतिन जाते हैं और कोई सामान्य नेता उनकी जगह लेता है, तो रूस के कुछ प्रतिबंध हट सकते हैं और कूटनीतिक रिश्ते सुधर सकते हैं. यहां एक तख्तापलट हो और पुतिन बाहर हो जाएं. हालांकि, मौजूदा स्थिति में इस बात की संभावनाएं कम ही नजर आती हैं, लेकिन यह उस स्थिति में असंभव भी नहीं है, जब पुतिन से फायदा पाने वालों के यह लगने लगे कि वे अब उनके हितों की रक्षा नहीं कर सकते.

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