June 14, 2026

आखिर आतंकियों का सहयोगी कौन। — बरिष्ठ पत्रकार श्री सियाराम मिश्रा MVDINDIA न्यूज़ राष्ट्रीय सचिव कलमकार के सिपाही

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कश्मीर में आतंकियों के हमदर्द कौन हैं ?
उन्हें नेस्तनाबूद करने में हिचक क्यों है ?
आईएसआई से पैसा कौन लेते है ?
पुलवामा के शहीदों को अंतिम विदाई दी जा चुकी है । उनके पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन भी हो चुके हैं , लेकिन आँखें अब भी आंसुओं से भरी हैं । बार-बार कुछ आवाजें चोट मारती हैं , तो रुलाई फूटने लगती है । हम मानते हैं कि कब तक हम सब रोते रहेंगे , गमगीन रहेंगे या गुस्से , आक्रोश में अपनी ही सार्वजनिक संपत्तियों की तोड़-फोड़ करते रहेगे ?
लेकिन जब-जब बच्चों की बिलखती , कांपती आवाज में सुनाई देती है – पापा ! जाओ , लौट आओ तो कलेजा कांप उठता है । आंसू अपनी परिधियाँ भूल जाते हैं । जब कोकल , अबोध , सूनी आंखों वाले कोमल चेहरों के साथ-साथ बूढ़े और युवाओं को भी दहाड़े मारते देखते-सुनते हैं , तो किसकी आंखें नम नहीं होंगी ?
सवाल उठते हैं कि 21 , 23 , 25 साल की उम्र भी क्या बलिदान की होती है ? यह तो सपनों और कल्पनाओं की उम्र है । ये कंधे तो परिवार के लिए होने चाहिए थे , लेकिन सब कुछ राख हो गया है । अभी तो पुलवामा के शहीदों की चिताएं भी ठंडी नहीं हुई थीं । शोक और वेदना के आवेग शांत नहीं हुए थे , लेकिन सीमा पार के हैवानों और आतंक प्रिय शैतानों ने कश्मीर के राजौरी में ही नियंत्रण-रेखा के पास एक और आईईडी विस्फोट किया , जिसमें सेना का एक मेजर भी शहीद हो गया । नौशेरा क्षेत्र में पाकिस्तान की ओर से फायरिंग भी की गई , नतीजतन दो जवान भी जख्यी हो गए । पाकिस्तान का यह रवैया सामान्य नहीं है । पलटवार की रणनीति हमारी सेना और सुरक्षा बल तय करेंगे । हम बिलकुल भी चिंतित नहीं हैं , लेकिन आम भारतीय की प्रतिक्रियाएं बेहद आक्रामक हैं । उनका खून इस कदर उबल रहा है कि वे चाहते हैं कि सीमा पार जाकर मसूद अजहर को ही मारकर मिट्टी बना दिया जाए । जैश-ए-मुहम्मद के इसी आतंकी सरगना ने 2001 में हमारी संसद पर हमला कराया
था । जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर भी आतंकी हमला कराने वाला यही शैतान था , जिसमें 38 जिंदगियां समाप्त हो गई थीं । यही वह आतंकी जानवर है , जिसे हमारी वाजपेयी सरकार को तिहाड़ से रिहा कर कंधार भेजना पड़ा था , क्योंकि अपहरण किए आईसी-814हवाई जहाज में सवार सैकड़ों भारतीयों को बलि नहीं दी जा सकती थी । मसूद के दाहिने हाथ अब्दुल रशीद गाजी को अफगानिस्तान से बुलाया ही इसलिए गया था , ताकि कश्मीर में हत्याओं के नए सिलसिले शुरू किए जा सके । इस नरसंहार में मसूद अजहर के भतीजे मुहम्मद उमर का भी नाम उभरा है ।मसूद के ऐसे न जाने कितने पिल्ले होगे , जो कश्मीर में आतंकवाद के मास्टर माइंड हो सकते हैं ।यह मसूद अजहर ही है , जिसकी पैरोकारी पाकिस्तान की नई इमरान खान हुकूमत ने की और चीन ने दोस्ती नाभाने की खातिर संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका और भारत के प्रस्तावों के खिलाफ वीटो का दुरुपयोग किया है । नतीजतन उस इनसानी मुखौटे के नरभक्षी को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित नहीं किया जा सका है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार साफ कर चुके हैं कि आतंकियों के सरपरस्तों ने बहुत बड़ी गलती कर दी है , लिहाजा उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ेगी ।बंदूक चलाने और थमाने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा । बम दागने और मुहैया कराने वालों को भी छोड़ा नहीं जाएगा । देश थोड़ा-सा धैर्य रखें , संयम न खोए , हमें इंतजार करना चाहिए कि हमारी सेनाएं कब और कैसा पलटवार करती हैं । हर साजिशकार की शामत आनी है ।हम दावे से कह सकते हैं कि सरकार अच्छी तरह जानती है कि कश्मीर में आतंकियों के हमदर्द कौन हैं ? पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से पैसे कौन लेते हैं ? उनके पनाहगाह तोड़ कर , उन्हें नेस्तनाबूद करने में हिचक क्यों है ?
पत्थरबाजों और स्थानीय आतंकियों की जीभ काटकर , हाथ-पांव तोड़ कर जेल की सलाखों के पीछे फेंक देना
चाहिए । दरअसल कश्मीर के भीतर ही एक पाकिस्तान और है , लिहाजा आमूल परिवर्तन से पहले उसकी तबाही जरूरी ह।