*दिल दहलाने वाला ब्लॉग*
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*‼️राजस्थान में “ओमिक्रोन” से ज्यादा ख़तरनाक़ बीमारी “सिलिकोसिस” से मर रहे हैं लोग‼️🤨*
_*मसूदा के दो गांवों में ही 160 लोगों की हो चुकी है मौत,इतने ही लोग कर रहे हैं मौत का इंतज़ार*_🙋♂️
_*सरकार और ज़िला प्रशासन की तन्द्रा से, खदानों में काम करने वालों को घसीट कर ले जा रही है मौत*_🙄
*✒️सुरेन्द्र चतुर्वेदी*
*राजस्थान में पत्थरों की खदानों में काम करने वाले लोगों की मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। लंबी जमात आए रोज़ मारी जा रही है। ओमिक्रोन से ज़ियादा जानलेवा बीमारी “सिलिकोसिस” हज़ारों घरों को मौत का तांडव दिखा चुकी है।*😨
*भीलवाड़ा और अजमेर ज़िले में मरने वालों की संख्या सर्वाधिक है। ब्यावर , अजमेर ,मकराना, बोरावड़, खीमसर (नागौर), बूंदी , भीलवाड़ा, किशनगढ़, कोटा ,जोधपुर ,जालौर और राजसमंद में सिलिकोसिस के मरीज़ लगातार बढ़ रहे हैं।*
*मेरी जानकारी के मुताबिक प्रदेश भर में लगभग 9000 मरीज इस समय भी मौत से लड़ रहे हैं ।यहां आपको बता दूँ कि अजमेर ज़िले में लगभग 900 मरीज़ आख़री सांस गिनने पर मजबूर है।*😨
*दोस्तों सरकार सो रही है! प्रशासन को दूसरे कामों से फ़ुर्सत नहीं! शहर स्मार्ट बनाए जा रहे हैं मगर सिलिकोसिस बीमारी से लड़ने की दिशा में कोई सोच नहीं रहा ।😣*
*अजमेर सहित प्रदेश भर में सिलिकोसिस से हालात ये हैं कि कई परिवारों में तो अब कमाने वाला तक नहीं बचा।खानों और पत्थरों की पिसाई व घिसाई करने वाले लोग फैक्ट्रियों में अपने शरीर की पिसाई कर रहे हैं ।फैक्ट्री मालिकों के लिए उनकी जान की कोई कीमत नहीं।*🤔
*अकेले अजमेर जिले में मेरे पास 141 लोगों के नाम पते हैं जो इस बीमारी से लड़ते हुए जान गवा चुके हैं। राजस्थान में खनन प्रभावित जिलों में इस बीमारी का दायरा तेज़ी से बढ़ रहा है मगर सरकार इस दिशा में कोई ठोस नीति नहीं बना पा रही।चिकित्सा मंत्रालय अखबारों में विज्ञापन देकर कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा है।🤨*
*राज्य सरकार ने सत्ता में आने के बाद अपना चुनावी वादा निभाते हुए सिलिकोसिस नीति को लागू तो कर दिया है मगर सच्चाई यह है कि राज्य के एक बड़े इलाके में रोज़ी रोटी के साथ जुड़ी इस जानलेवा बीमारी का कोई सार्थक इलाज़ अब तक सामने नहीं आया है।*
*ऐसा नहीं कि गंभीर हुए हालातों की जानकारी जिला अधिकारियों को नहीं मगर उनके लिए गरीब मजदूरों की मौत शायद कोई मायने नहीं रखती।*😣
*इन्ही दिनों मुझे मेरे पत्रकार मित्र हेमंत यादव ने अपने साथ ले जाकर बीमारी से प्रभावित इलाकों का दौरा करवाया ।हम मसूदा पहुंचे। गांव जीतपुरा और दौलतपुरा में हमारा जाना हुआ। इन गांवों में 72 घर हैं। जिनमें 200 परिवार रहते हैं ।आपका दिल दहल जाएगा जब आपको बताया जाएगा कि इन 200 परिवारों में 160 विवाहिताओं की मांग सिलिकोसिस बीमारी ने उजाड़ दी है। यही नहीं इस इलाके के 187 लोग आज भी इस बीमारी से जूझ रहे हैं। ज़ाहिर है कि ये लोग भी बहुत जल्दी मौत के मुंह में चले जाएंगे। इनका कहीं कोई सही दिशा में इलाज़ हो ही नहीं रहा ।पूछताछ पर पता चला कि इस क्षेत्र के लोग बिजोलिया और आसपास की खानों में काम कर रहे हैं। दौलतपुरा द्वितीय क्षेत्र के अभी भी करीब 400 लाेग पत्थरों की उन्ही खदानों में मजदूरी कर रहे हैं जहाँ कभी उनके पिता या दादा मजदूरी करते थे। इस क्षेत्र में 129 लोगों को सिलिकोसिस की पुष्टि हो चुकी है। सार्टिफिकेट जारी होने के बाद 25 लोगों की तो मौत तक हो चुकी है।😩*
*ब्यावर और मसूदा उपखंड में सैकड़ों मजदूरों की त्रासदी यह है कि पेट पालने के लिए पत्थर तोड़ना उनकी मजबूरी है और वही पत्थर उनकी सांसों में घुलकर उन्हें मौत की ओर धकेल रहा है। दोनों उपखंड में 1 हज़ार से ज्यादा खान और रीको फैक्ट्रियों के मजदूर हैं। इनमें से ज्यादातर सांस की बीमारी, टीबी और सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं।😨*
*खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। उसके बावजूद विडंबना यह है कि सिलिकाेसिस का शिकार साबित कराने के लिए भी मजदूरों को मशक्कत करनी पड़ रही है। कई गांव ऐसे हैं जहां हर दिन कोई न कोई मजदूर काल का ग्रास बनता है। कई लोगों का वजन बच्चों से भी कम हो गया है।*😒
*भीलवाड़ा के बिजौलिया और ब्यावर के रीको क्षेत्र में मजदूरी करने आने वाले ब्यावर और मसूदा उपखंड के 8 गांवों के सैकड़ों युवा इस बीमारी की चपेट में हैं। इन गांवों में 50 से लेकर 150 परिवार ऐसे हैं जिनके मुखिया काल का ग्रास बन चुके हैं तो कई ऐसे भी हैं जो पलंग पर पड़े मौत का इंतजार कर रहे हैं। देवास देदपुरा में वर्तमान में करीब 300 लोगों की मौत हो चुकी है जो पत्थरों के काम से जुड़े थे। इनमें से कई की तो जांच ही नहीं हो सकी और टीबी का इलाज लेते हुए इनकी मौत हो गई। महज 58 लोगों को ही सिलिकोसिस का सार्टिफिकेट मिल सका। 700 से ज्यादा श्रमिक इस क्षेत्र में सिलिकोसिस के संदिग्ध हैं। 152 तो अभी भी जांच के इंतजार में हैं।*🙄
*सरकार ने सिलिकोसिस पीड़ितों के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं व अन्य अफसरों के साथ विचार-विमर्श के बाद जो पॉलिसी ड्राफ्ट की थी उसमें सिलिकोसिस पीड़ितों को 5 लाख रुपए का मुआवजा और 4 हजार रुपए जीविकोपार्जन के लिए तथा सिलिकोसिस पीड़ित की मृत्यु के बाद उसके आश्रित को 3 हजार 500 रुपए पेंशन दिए जाने का प्रस्ताव था। मगर जब नीति आई तो सिलिकोसिस पीड़ितों को विशेष योग्यजन में शामिल करते हुए महज 1500 रुपए प्रतिमाह पेंशन की स्वीकृति जारी की गई है।पत्थर की खदानों पर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले गरीब आदिवासी मजदूरों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पत्थर खदानों से उड़ने वाली डस्ट से होने वाली जानलेवा बीमारी सिलिकोसिस के नाम पर टीबी का इलाज दिया जा रहा है। यही कारण है कि तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी बीते डेढ़ वर्ष में विभाग सिलिकोसिस से ग्रसित एक भी मरीज नहीं खोज पाया है।चौंकाने वाली बात यह है कि सिलिकोसिस के नाम पर टीबी की जांच की जाती है, जिससे सिलिकोसिस के ग्रसित सही मरीजों की पहचान नहीं हो पाती और वे इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं। जिला क्षय रोग चिकित्सक मानते हैं कि टीबी की जांच से सिलिकोसिस की बीमारी का पता नहीं चलता, क्योंकि टीबी की जांच बलगम, रक्त व एक्सरे की सहायता से की जाती है। वहीं सिलिकोसिस की बीमारी में मरीजों के फेफड़ों में पत्थर के कण जमा हो जाते हैं, इसका पता अल्ट्रासाउण्ड, वायोप्सी जांच से ही लगाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में विभागीय सर्वेक्षण के दौरान अब तक सिलिकोसिस से ग्रसित एक भी मरीज सामने नहीं आया है। जबकि, जमीनी सच्चाई यह है कि सिलिकोसिस की बीमारी खदानों पर काम करने वाले मजदूरों को असमय मौत की नींद सुला रही है, इसका उदाहरण है ग्राम रमपुरा में रहने वाले अनेक मजदूर कम उम्र में अपनी जान गवां चुके हैं। इस गाँव में कम उम्र की आदिवासी विधवा महिलाएं ही शेष बची हैं। असमय मौत के शिकार बने अनेक मजदूरों की विधवाएं और उनके मासूम बच्चे उदरपूर्ति के लिए खदानों पर काम करने को विवश हैं। इन गरीब मजदूरों की जान की परवाह न तो उनसे काम लेने वालों को है और न ही स्थानीय प्रशासन को।*🤷♂️
*हर बार जनता के दुख दर्दों पर आधारित ब्लॉग लिख कर मैं अपने मन का बोझ हल्का भले ही कर लूं मगर सच तो यही है कि आज़ादी का उजाला सिर्फ़ राजपथों पर ही रोक लिया गया है।मेरा एक शेर भी सुन लें।*🙋♂️
_*कटी पतंग का रूख़ अपने घर की जानिब था,*_
_*उसे भी लूट लिया लंबे हाथ वालों ने*_🤦♂️

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