*प्रकाशनार्थ / प्रेस विज्ञप्ति*
*काशी में ब्राह्मणों ने भरी हुंकार*
*ब्राह्मण कल्याण बोर्ड बनाने की मांग*
*धर्मसंघ में हुआ महाधिवेशन का आगाज*
*भारत का मुख्य आधार ही ब्राह्मणों से शुरू होता है।* – लक्ष्मीकान्त बाजपेयी
*महाधिवेशन में रखे गए प्रस्तावित विचारणीय विषय :-*
1) *जातीय आरक्षण के बजाय आर्थिक आरक्षण लागू किया जाय*
2) *समान नागरिक संहिता का पालन किया जाय*
3) *ब्राह्मण कल्याण बोर्ड की स्थापना की जाय*
4) *कृषि योग्य भूमि का व्यवसायी करण बंद किया जाय*
5) *देवी-देवताओं की मूर्तियों व फ़ोटो का व्यवसायीकरण रोका जाए*
6) *मठ-मंदिरों के पुजारियों को एक निश्चित मानदेय/वेतन दिया जाय*
वाराणसी /26 मार्च / दुर्गाकुंड स्थित धर्मसंघ में रविवार को केन्द्रीय ब्राह्मण महासभा के दो दिवसीय ७वें राष्ट्रीय महाधिवेशन का भव्य आयोजन प्रात: 10 बजे से प्रारम्भ हुआ । महाधिवेशन के प्रथम दिन उद्घाटन में बड़ी संख्या में ब्राह्मण समाज के लोगों ने भाग लिया । महाधिवेशन में ब्राह्मण समाज की ओर से ब्राह्मण कल्याण बोर्ड बनाने,जातीय आरक्षण के बजाय आर्थिक आरक्षण लागू करने,समान नागरिक संहिता का पालन,ब्राह्मण कल्याण बोर्ड की स्थापना,कृषि योग्य भूमि का व्यवसायी करण बंद कराना,देवी-देवताओं की मूर्तियों व फ़ोटो का व्यवसायीकरण रोकना, मठ-मंदिरों के पुजारियों को एक निश्चित मानदेय/वेतन दिया जाय आदि की मांग उठाई गई । कार्यक्रम के माध्यम से ब्राह्मण समाज ने राजनैतिक दलों को अपनी ताकत दिखाई। प्रथम दिन दोनों सत्रों में देश के विभिन्न प्रान्तों से आए लगभग आठ सौ से ज्यादा ब्राह्मणों ने भाग लिया। इसमें काफी संख्या में संत भी शामिल थे।महाधिवेशन में चिंतन और मनन करके समाज के भविष्य की योजनाओं पर निर्णय किया गया।
*ब्राह्मण समाज का इतिहास भारत के वैदिक धर्म से आरम्भ होता है।–* डा.लक्ष्मीकान्त बाजपेयी
*बिना किसी समाज की बुराई करते हुए अपने समाज के उत्थान में लगे* – डा. लक्ष्मीकान्त बाजपेयी
मुख्य अतिथि राज्यसभा सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने अपने संबोधन में कहा कि वास्तव में ब्राह्मण कोई जाति विशेष ना होकर एक वर्ण है,भारत का मुख्य आधार ही ब्राह्मणों से शुरू होता है। ब्राह्मणों का भारत की आज़ादी में भी बहुत योगदान रहा है जो इतिहास में गढ़ा गया है। ब्राह्मणों के सभी सम्प्रदाय वेदों से प्रेरणा लेते हैं। पारम्परिक तौर पर यह विश्वास है कि वेद अपौरुषेय तथा अनादि हैं, बल्कि अनादि सत्य का प्राकट्य हैं जिनकी वैधता शाश्वत है। वेदों को श्रुति माना जाता है प्राचीन काल में हर जाति, समाज आदि का व्यक्ति ब्राह्मण बनने के लिए उत्सक रहता था। ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को आज भी है। चाहे वह किसी भी जाति, प्रांत या संप्रदाय से हो वह गायत्री दीक्षा लेकर ब्रह्माण बन सकता है, लेकिन ब्राह्मण होने के लिए कुछ नियमों का पालन करना होता है। हम उस ब्राह्मण समाज की बात नहीं कर रहे हैं जिनमें से अधिकतर ने अपने ब्राह्मण कर्म छोड़कर अन्य कर्मों को अपना लिया है। हालांकि अब वे ब्राह्मण नहीं रहे लेकिन कहलाते अभी भी ब्राह्मण ही है। *महाधिवेशन के दौरान पूरा धर्मसंघ शिक्षा मंडल केसरिया साफे और पीले रंग के झंडों से सराबोर नजर आया कार्यक्रम में शुरू से आखिर तक पूजा, भजन आदि के साथ लोग झुमते रहें। इस दौरान ‘एक ही नारा एक ही नाम जय श्री राम, जय श्रीराम…, जब-जब ब्राह्मण बोला है, राज सिंहासन डोला है..आदि नारे लगते रहे ।*
*मुझे विधायक मत बोलना,भाई बोलो* – डा.नीलकंठ तिवारी
विशिष्ट अतिथि शहर दक्षिणी के लोकप्रिय विधायक व पूर्व राज्यमंत्री डा.नीलकंठ तिवारी ने महाधिवेशन में समाज के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि कोई विधर्मी हमारी बहन-बेटी को परेशान करे तो परशुराम बन जाओ। समाज में एक दूसरे की टांग खींचना बंद करके में एक दूसरे का साथ दो भगवान परशुराम जी के आदर्श पदचिह्नों पर चलने की जरुरत है। पूर्व मंत्री डा.नीलकंठ तिवारी ने कहा कि हमारी यह एकता राष्ट्र के निर्माण में और अधर्म को दूर करने में लगेगी। आप लोग धर्म को धारण करने वाले हो, आप धर्म की रक्षा करने वाले हो। परशुरामजी ने भगवान शिव से विराट तपस्या के बाद धर्म की रक्षा के लिए फरसा प्राप्त किया था। सब में यही ऊर्जा और एकता रहनी चाहिए। इन्होनें कहा कि मैं आपका भाई हूं। आप मुझे विधायक जी मत बोलना । मुझे कभी नीलकंठ जी मत बोलना, मुझे केवल नीलकंठ भाई बोलना। सभा में विधायक डा. नीलकंठ तिवारी ने साहित्यिक भाव में कई प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए ब्राह्मण को राष्ट्रवादी बताया।
स्वागत भाषण करते महामंत्री डा. राजेश पाठक ने कहा कि EWS आरक्षण में वह सारे लाभ मिलने चाहिए जो दूसरे आरक्षण में मिलते हैं। कहा कि मंदिरों पर केवल हिंदुओं का अधिकार होना चाहिए।
कार्यक्रम का सफल संचालन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा.गणेश दत्त शास्त्री ने किया। प्रारम्भ में डा.अमलेश शुक्ला व सुश्री आस्था शुक्ला ने सुमधुर भजन प्रस्तुत किया। महाधिवेशन में राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित कमलाकांत उपाध्याय ने संगठन का वार्षिक लेखा-जोखा व कार्यक्रम की विषय प्रस्तावना सबके समक्ष रखा। युवमंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.अरुण उपाध्याय ने संस्था की पत्रिका *जनमानस* का विमोचन मंचस्थ सभी अतिथियों के कर-कमलों से कराया। अध्यक्षता कर रहे धर्मसंघ शिक्षामंडल के महामंत्री डॉ.जगजीतन पाण्डेय ने किया और कहा ब्राह्मण समाज के उत्थान के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम होते रहने चाहिए।
*राजनैतिक प्रतिनिधित्व व ब्राह्मण कल्याण बोर्ड देने की मांग*
महाधिवेशन के जरिए ब्राह्मण समाज ने अपनी एकजुटता और ताकत दिखाई है। ब्राह्मण समाज हाशिये पर है। इस शक्ति प्रदर्शन के जरिए राजनैतिक पार्टियों को अपनी ताकत का अहसास कराना है। जिससे आगामी लोकसभा चुनावों के दौरान वे ब्राह्मण समाज को केवल वोट बैंक समझने की भूल नहीं करे और उचित प्रतिनिधित्व का अवसर दें साथ ही समाज के उत्तरोत्तर वृद्धि हेतु ब्राह्मण कल्याण बोर्ड की स्थापना होनी चाहिए
*उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास-* डा.मंजूलता त्रिपाठी
दूसरे सत्र में महिला मंच की राष्ट्रीय अध्यक्ष डा.मंजूलता त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि उपनाम में ही छुपा है सारा इतिहास जैसे
1. मात्र : ऐसे ब्राह्मण जो जाति से ब्राह्मण हैं लेकिन वे कर्म से ब्राह्मण नहीं हैं उन्हें मात्र कहा गया है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं कहलाता। बहुत से ब्राह्मण ब्राह्मणोचित उपनयन संस्कार और वैदिक कर्मों से दूर हैं, तो वैसे मात्र हैं। उनमें से कुछ तो यह भी नहीं हैं। वे बस शूद्र हैं। वे तरह तरह के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और रात्रि के क्रियाकांड में लिप्त रहते हैं। वे सभी राक्षस धर्मी भी हो सकते हैं।
2. ब्राह्मण : ईश्वरवादी, वेदपाठी, ब्रह्मगामी, सरल, एकांतप्रिय, सत्यवादी और बुद्धि से जो दृढ़ हैं, वे ब्राह्मण कहे गए हैं। तरह-तरह की पूजा-पाठ आदि पुराणिकों के कर्म को छोड़कर जो वेदसम्मत आचरण करता है वह ब्राह्मण कहा गया है।
3. श्रोत्रिय : स्मृति अनुसार जो कोई भी मनुष्य वेद की किसी एक शाखा को कल्प और छहों अंगों सहित पढ़कर ब्राह्मणोचित 6 कर्मों में सलंग्न रहता है, वह ‘श्रोत्रिय’ कहलाता है।
4. अनुचान : कोई भी व्यक्ति वेदों और वेदांगों का तत्वज्ञ, पापरहित, शुद्ध चित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला और विद्वान है, वह ‘अनुचान’ माना गया है।
5. भ्रूण : अनुचान के समस्त गुणों से युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्याय में ही संलग्न रहता है, ऐसे इंद्रिय संयम व्यक्ति को भ्रूण कहा गया है।
6. ऋषिकल्प : जो कोई भी व्यक्ति सभी वेदों, स्मृतियों और लौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर मन और इंद्रियों को वश में करके आश्रम में सदा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निवास करता है उसे ऋषिकल्प कहा जाता है।
7. ऋषि : ऐसे व्यक्ति तो सम्यक आहार, विहार आदि करते हुए ब्रह्मचारी रहकर संशय और सदेह से परे हैं और जिसके श्राप और अनुग्रह फलित होने लगे हैं उस सत्यप्रतिज्ञ और समर्थ व्यक्ति को ऋषि कहा गया है।
8. मुनि : जो व्यक्ति निवृत्ति मार्ग में स्थित, संपूर्ण तत्वों का ज्ञाता, ध्याननिष्ठ, जितेन्द्रिय तथा सिद्ध है ऐसे ब्राह्मण को ‘मुनि’ कहते हैं।
उपरोक्त में से अधिकतर ‘मात्र’नामक ब्राह्मणों की संख्या ही अधिक है।
*राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा.गणेश दत्त शास्त्री ने अपने संबोधन में बताया कि सबसे पहले ब्राह्मण शब्द का प्रयोग अथर्वेद के उच्चारण कर्ता ऋषियों के लिए किया गया था। फिर प्रत्येक वेद को समझने के लिए ग्रन्थ लिखे गए उन्हें भी ब्रह्मण साहित्य कहा गया। ब्राह्मण का तब किसी जाति या समाज से नहीं था। समाज बनने के बाद अब देखा जाए तो भारत में सबसे ज्यादा विभाजन या वर्गीकरण ब्राह्मणों में ही है जैसे:- सरयूपारीण, कान्यकुब्ज , जिझौतिया, मैथिल, मराठी, बंगाली, भार्गव, कश्मीरी, सनाढ्य, गौड़, महा-बामन और भी बहुत कुछ। इसी प्रकार ब्राह्मणों में सबसे ज्यादा उपनाम (सरनेम या टाईटल ) भी प्रचलित है।*
*अखिल भारतीय ब्राह्मण न्यास परिषद के अध्यक्ष पण्डित प्रमोद कुमार मिश्र ने कहा कि एक वेद को पढ़ने वाले ब्रह्मण को पाठक कहा गया। दो वेद पढ़ने वाले को द्विवेदी कहा गया, जो कालांतर में दुबे हो गया। तीन वेद को पढ़ने वाले को त्रिवेदी कहा गया जिसे त्रिपाठी भी कहने लगे, जो कालांतर में तिवारी हो गया।चार वेदों को पढ़ने वाले चतुर्वेदी कहलाए, जो कालांतर में चौबे हो गए। शुक्ल यजुर्वेद को पढ़ने वाले शुक्ल या शुक्ला कहलाए। चारो वेदों, पुराणों और उपनिषदों के ज्ञाता को पंडित कहा गया, जो आगे चलकर पाण्डेय, पांडे, पंडिया, पाध्याय हो गए। ये पाध्याय कालांतर में उपाध्याय हुआ।शास्त्र धारण करने वाले या शास्त्रार्थ करने वाले शास्त्री की उपाधि से विभूषित हुए। इनके अलावा प्रसिद्द ऋषियों के वंशजो ने अपने ऋषिकुल या गोत्र के नाम को ही उपनाम की तरह अपना लिया, जैसे :- भगवन परसुराम भी भृगु कुल के थे। भृगु कुल के वंशज भार्गव कहलाए, इसी तरह गौतम, अग्निहोत्री, गर्ग, भरद्वाज आदि।*
दूसरे सत्र के अतिथियों अपने संबोधन में बताया कि बहुत से ब्राह्मणों को अनेक शासकों ने भी कई तरह की उपाधियां दी, जिसे बाद में उनके वंशजों ने उपनाम की तरह उपयोग किया। इस तरह से ब्राह्मणों के उपनाम प्रचलन में आए। जैसे राव, रावल, महारावल, कानूनगो, मांडलिक, जमींदार, चौधरी, पटवारी, देशमुख, चीटनीस, प्रधान, बनर्जी, मुखर्जी, जोशीजी, शर्मा, भट्ट, विश्वकर्मा, मैथली, झा, धर, श्रीनिवास, मिश्रा, मेंदोला, आपटे आदि हजारों सरनेम है जिनका अपना अलग इतिहास है।
महाधिवेशन का शुभारम्भ पाणिनी कन्या महाविद्यालय के छात्राओं के मंगलाचरण पाठ से हुआ। इसके बाद अतिथियों ने भगवान परशुराम की फोटो के समक्ष दीप प्रज्जवलन किया। समाज मे उत्कृष्ट कार्य करने वाले कुछ महानुभावों का सम्मान भी किया गया जनमें पद्मश्री चूड़ामणि गोपाल,प्रो. टी.पी. चतुर्वेदी, प्रो. वी. के.दीक्षित,प्रो. बी. मुखोपाध्याय,पंडित महेश दूबे,पंडित प्रमोद कुमार मिश्र,पण्डित आनंद उपाध्याय,डॉ. प्रीति विमर्शिनी,कृष्णानंद चौबे,प्रो. सत्यव्रत द्विवेदी, इंजीनियर अशोक कुमार मिश्र,पंडित देवव्रत द्विवेदी,कमलेश तिवारी आदि थे। इसके बाद विभिन्न प्रान्तों से आए ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों का अभिनन्दन किया। उपस्थित अन्य प्रमुख लोगों में प्रो. जे.एस. त्रिपाठी,संदीप चतुर्वेदी, डीजीसी आलोक चंद्र शुक्ला,पवन शुक्ला,शुभम तिवारी,विशाल शास्त्री,राकेश तिवारी,ओंकार नाथ तिवारी,हेरम्ब मिश्रा,अंजिनी तिवारी, सुनील उपाध्याय,संजय तिवारी,जयप्रकाश उपाध्याय, बृजेश तिवारी आदि शामिल थे।
धन्यवाद ज्ञापन पंडित अरुण उपाध्याय ने दिया।





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