सिया राम मिश्र ….
शारदीय नवरात्र में द्वितीया तिथि माता ब्रह्मचारिणी के पुजन-अर्चन के लिए मान्य है । काशी नगरी में यह स्थान उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर दुर्गाघाट के उपर विराज मान है ।माताजी तारा भगवती देवी का मंदिर काशी में नेपाली खपड़ा ब्रम्हनाला में विराजमान है । मंदिर में शास्त्रीय नवरात्र विधि-विधान से पूर्व की भाति यद किन्चित होता आ रहां है । पुजन-अर्चन , अनुष्ठान का कार्य जनकल्याण के लिए याचना से किया जा रहा है । मंदिर के मैनेजर पं. योग दत्त झा जिन्हें न्यायालय ने मंदिर में पुजन-अर्चन एवं राग-भोग , आरती-पुजा , अतिथि अनागत , काशी बासी अर्थात मुमुक्षूणां अर्थात जो लोग काशी मरने के लिए आते है उनका भी स्थान भोजन यद किन्चित होता रहता है ।आचार्य पुजारी किर्ती दत्त झा ने जानकारी दिया की माता अम्बे जगतजननी भगवती का आगमन इस बार मणिद्वीप से मृत्यूलोक में नौक पर आई है । जिसके कारण राष्ट्र खुशहाल आन्नद कारक रहेगा । जो राजा और प्रजा दोनों के लिए बेहतर है । उसका फल है ” नौकायां सर्वसिद्धिस्यात् ” प्रस्थान गज पर होगा । गज का प्रतिक है ” गजे च जलदा देवि ” यानि जल वृष्ट ” किसानों के लिए वर्षा प्रचुर मात्रा में वर्ष प्रयत्न होगा ।
वैसे तो जन मानस में चार नवरात्र का विधान है पर चैत्र नवरात्र( वासंतिक ) एवं (आश्विन ) शारदीय नवरात्र दोनों प्रधान नवरात्र है । जिन्हें हम जनकल्याण के लिए अपने घरों एवं सार्वजनिक स्थलों पर माता भगवती के प्रतिमा को वैदिक आचार्य से प्राण प्रतिष्ठा करा कर पुजन-अर्चन करते है ।
समज में मान्य चार रात्रि है कालरात्रि ( दिपावली ) की रात्रि , महारात्रि ( शारदीय नवरात्रि ) में महाअष्टमी की रात्रि महारात्रि कहलाती है । मोहरात्रि कृष्णा अष्टमी कहलाती है । महाशिवरात्रि को दारूणा रात्रि मनाया जाता है …….

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