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Siyarammishra Varanasi
वाराणसी : शारदीय नवरात्र के अन्तिम दिन सूर्यनारायण के पुर्व से पश्चिम में दिन की यात्रा समाप्त कर सायंकाल होने पर अंधेरे चादर ने जैसे ही शिव की नगरी काशी में अपना आचल फैलाना प्रारंभ किया उसी क्षण रोशनी से जगर-मगर सड़कों पर आस्थावान धर्मपरायण स्त्री-पुरुषों व बच्चों का चहकना प्रारंभ हुआ देखते-देखते लाखों लाख कदमों की चहलकदमी , शहर में नहीं हुई रात । हर सड़क , हर गली श्रद्धालुओं का रेला , क्या शिवपुर और क्या लंका , क्या राजघाट और क्या लहुराबीर व चेतगंज , गोदौलिया , जंगमबाड़ी , मानो मां जगदंबा की कृपा से सजा एक अंतहीन मेला । पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक सजे पूजा मंडपों में ढाक के डंकों की टनकार , कोटि-कोटि कंठों से शेरावाली , पहाड़ा वाली मां की महिमा की जयकार । दुर्गा पूजन की समापन निशा ( नवमी ) को शक्ति के ओज तेज से तरोताज़ा शिव की नगरी काशी का बस यही हाल था ।
कहां गया आलस्य और कैसी थकान , लोगों का कदमताल तो बस एक के बाद दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा पूजा स्थान । क्या बुजुर्ग और क्या बच्चे , क्या पुरुष और क्या महिलाएं , बस ललक थी कि माँ भगवती की किस-किस छवि को अपने नैनो में समाहित कर लिया जाएं ।
हथुआ मार्केट , नई सड़क , मछोदरी , मैदागिन , गोदौलिया , सोनारपुरा सिगरा , लंका , शिवपुर और पांडेयपुर का तो यह हाल था कि भीड़ में राई ( सरसो ) का दाना फेक दिया जाए तो जमिन पर नहीं पड़ता , जन ज्वार के असंख्य नरमुंड के उमड़ते-घुमड़ते जन सागर में एक पर एक मिले जा रहे थे । गली-मुहल्लों में भी हर जगह उत्सवप्रेमियों के जयकारे लगाते हुए व मैया के महिमा बखानते गीतों के जोशीले कानफोड़ू गीत बज रहे थे ।

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