//सभी सहयोगियों के ध्यानार्थ//
किसी भी स्थिति में आधिकारिक और प्रामाणिक सूचनाएं ही प्रकाशित की जाएं या डिजिटल प्लेटफार्म पर डाली जाएं।
कोविड 19 (कोरोना वायरस डिजीज 2019) की वैश्विक महामारी से जुड़ी खबरों के कवरेज के संदर्भ सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश का विवरण यहां है। इसे ध्यान से पढ़ें।
इस संबंध में केंद्र सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (PIB) और भारतीय प्रेस परिषद् (प्रेस काउंसिल) के निर्देश भी प्रेषित हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के भी इस सम्बन्ध में निर्देश हैं।
मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने 31 मार्च को जारी निर्देश में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया सहित सभी तरह के मीडिया से अपनी जिम्मेदारी को सही तरह से निभाने को कहा है। उसने कहा है कि मीडिया अप्रमाणित और डर फैलाने वाली खबरें न दे।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में आपदा प्रबंधन कानून 2005 में उल्लिखित दंडात्मक प्रावधानों का भी उल्लेख किया है। इसके तहत एक साल तक की कैद और / या जुर्माने का प्रावधान है। इसी के साथ न्यायालय ने भारतीय दंड विधान (IPC) की धारा 188 के प्रावधान का भी उल्लेख किया है।
कोरोना वायरस के संदर्भ में आजकल सोशल मीडिया पर सूचनाओं की बाढ़ सी आई हुई है। इसमें अप्रामाणिक सूचनाएं तेजी से फैल रही हैं। ऐसी कई सूचनाएं इस तरह फैलाई जाती हैं जो सच जैसी प्रतीत हों। लोग उन पर भरोसा भी कर लेते हैं। इससे अखबारों की खबरें भी प्रभावित हो रही हैं। हाल में कुछ खबरें इसी तरह की अप्रामाणिक सूचनाओं के आधार पर छप गई हैं।
एक जिम्मेदार समाचार माध्यम होने के नाते ऐसे समय में हमें और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। इतनी सूचनाओं की भीड़ में भी अखबार की खबरों की विश्वसनीयता के कारण पाठकों की हमसे ज्यादा अपेक्षाएं हैं। भ्रामक सूचनाओं और अफवाहों से बचते हुए हम सिर्फ तथ्यात्मक सूचनाओं से ही अपने पाठकों को जागरूक करेंगे।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि अगर मीडिया लोगों को जागरूक करने में सहायता करे तो COVID-19 को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और इसकी भयावहता भी कम हो सकती है।
साभार

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