कोर्ट से तारीख पर तारीख मिला किसी निर्दोश के लिए न्याय पाने के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि कोर्ट द्वारा मिलने वाली यही तारीखे व्यक्ति को मामले में इंसाफ दिलाने के लिए भी लंबा सफर तय करा देती हैं, सही सुना आपने ऐसा ही मामला शामली जिले का है जहां एक किसान को कारतूस रखने के आरोप से रिहाई पाने में 26 साल लग गए। और इन 26 सालों में उसे कोर्ट से 250 से भी ज्यादा बार कोर्ट की तारीखों से भुगतना पड़ा। जिसके बाद कोर्ट ने सबुतों के अभाव में उसे बरी कर दिया है। लेकिन ऐसे में उसके जीवन की आधी कमाई इन तारीखों के चक्कर में ही लग गई।
1995 में किया था गिरफ्तार
दरअसल इस पूरे मामले में कोर्ट के चक्कर काटने में व्यक्ति के पैर के अंगूठे में चोट लगी, जो गैंग्रीन में बदल गई है। 8 सालों से वह इस जख्म को लेकर जिंदा हैं। किसान के मुताबिक पारिवारिक रंजिश के चलते उसे मामले में झूठा फंसाया गया था। बचाव पक्ष के अधिवक्ता ठा. जगपाल सिंह के मुताबिक वर्तमान में शामली के कस्बा बनत निवासी सलाउद्दीन को कोतवाली पुलिस ने 1995 में चुंगी नंबर 2 के मिमलाना रोड से गिरफ्तार किया है। पुलिस ने वयक्ति पर 12 बोर के 4 कारतूस बरामदगी का आरोप लगाया था।
चेकिंग के दौरान किया था गिरफ्तार
आपको जानकारी देते हुए बता दें कि 15 जून 1995 को तत्कालीन शहर कोतवाली प्रभारी निरीक्षक पीएन सिंह को सूचना मिली थी कि कुछ लोग मिमलाना रोड साइड से आ रहे हैं उनके पास अवैध हथियार भी हैं। प्रभारी निरीक्षक के निर्देशों पर उप निरीक्षक युवराज सिंह ने चेकिंग के दौरान सलाउद्दीन को 12 बोर के 4 कारतूस के साथ गिरफ्तार किया था। पुलिस ने सलाउद्दीन का धारा-25 शस्त्र अधिनियम के तहत चालान भी किया था। इसके बाद वह 20 दिन जेल में रहा ओर बेल मिलने पर रिहा हुआ।
20 साल में भी पेश नहीं किए पुलिस ने सुबूत
सलाउद्दीन ने जेल से बरी होने के बाद तत्कालीन डीएम से अधिनियम के तहत केस चलाने की इज्जात लेकर विवेचना के बाद कोर्ट में चार्जशीट दायक की। केस की सुनवाई सीजेएम कोर्ट में हुई। कोर्ट में जो चार्जशीट पेश की गई थी उसपर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने 17 जुलाई 1999 को सलाउद्दीन पर आरोप तय किया। जिसके बाद फाइल सुबूत में चली गई। कोर्ट ने मामले में सलाउद्दीन के खिलाफ सुबूत पेश करने के लिए समय दिया। कई बार पर्याप्त अवसर दिए जाने के बाद भी मामले में पुलिस आरोपी के खिलाफ साक्ष्य नहीं जुटा पाई। कोर्ट ने 20 साल बाद आठ अगस्त 2019 को सुबूत का समय समाप्त किया। इस तरह 20 साल हो गए लेकिन एक भी सुबूत कोर्ट में पेश नहीं किया गया। यहां तक कि माल मुकदमा भी कोर्ट में पेश नहीं किया गया।
साक्ष्य के अभाव में कोर्ट ने किया बरी
मामले में साक्ष्य पेश करने का जो समय कोर्ट से मिला था वह खत्म होने के बाद सीजेएम कोर्ट में आरोपी के धारा-313 के तहत बयान लिया गया। सलाउद्दीन ने आरोपों को निराधार बताया। इसके बाद दोनों पक्षों की सुनवाई कर सीजेएम मनोज कुमार जाटव ने आरोपी सलाउद्दीन को संदेह का लाभ देते हुए 10 नवंबर को बरी कर दिया।
मुकदमे में गुजर गई पूरी जिंदगी
दरअसल कोर्ट द्वारा तारीख पर तारीख मिलने व पेश होने के चलते 62 साल से भी ज्यादा सलाउद्दीन की उम्र हो गई। आधी जिंदगी केस की पैरोकारी में गुजर गई। आपको बता दें कि सलाउद्दीन एक छोटा किसान है और पारिवारिक रंजिश के चलते उसे झूठा फंसवाया गया था। पूरे मामले के दौरान उसने 250 से ज्यादा तारीख भुगती। सलाउद्दीन ने कहा कि केस लड़ने के लिए शुरुआत में 1500 रुपए में वकील किया था। हर तारीख पर 50 रुपए खर्च होते थे। इसके बाद महंगाई बढ़ी तो हर तारीख का खर्च 500 रुपए बढ़ गया। इस तरह मुकदमे की पैरोकारी में जिंदगी की आधी कमाई लग गई।
आखिर कहां हुई चूक
अभियोजन अधिकारी गंगाशरण का कहना है कि समीक्षा की जा रही है कि आखिर कहां चूक हुई। यदि पर्याप्त साक्ष्य होंगे तो निर्णय के विरुद्ध उच्च अदालत में अपील करेंगे।

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