August 8, 2026

कुनबे को साधना अखिलेश की बड़ी चुनौती- अमित कुमार प्रजापति

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कुनबे को साधना अखिलेश की बड़ी चुनौती

 

राजभर, जयंत व शिवपाल छिटक सकते हैं समाजवादियों से

 

सीटों के बंटवारे को ले साथियों से नहीं बैठ रही सपा की पटरी

 

रामगोपाल के साथ नहीं मिल पा रहा शिवपाल का दिल

 

भाजपा अखिलेश के साथियों से है निरंतर संपर्क में

 

 

 

लखनऊ। उप्र सहित 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो चुका है। इसी के साथ विभिन्न राजनीतिक दल अब अनौपचारिक रुप से चुनावी मोड में आ गये हैं। प्रदेश के एक राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए ऐसा समझा जा रहा है कि उप्र में मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी और भाजपा के मध्य होगा, हालांकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसे इकतरफा बनाने की कोशिशों में जुटा है। समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव भी इसमें सत्ताधारी दल की मदद करते लग रहे हैं। लम्बे समय से अखिलेश यादव यह घोषणा करते चले आ रहे हैं कि समाजवादी पार्टी इस बार बड़े दलों को तरजीह न देकर छोटे दलों के साथ गठबंधन करेगी। ऐसे आधा दर्जन से ऊपर दलों के साथ समाजवादी पार्टी का गठजोड़ हो भी चुका है। इनमें राष्ट्रीय लोकदल और चाचा शिवपाल सिंह यादव की पार्टी प्रसाद भी है। लेकिन इतने दलों से गठजोड़ के बाद भी अब तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि अखिलेश की पार्टी गठबंधन धर्म निभाते हुए किसे कितनी सीटें दे रहीं हैं। इस संदर्भ में यह खबरें आई थीं कि अखिलेश अपने साथी जयंत चौधरी की पार्टी को पश्चिमी उप्र में सीधे तौर पर 32 और समाजवादी पार्टी के सिंबल पर 8 यानि कुल 40 सीटें दे रहे हैं। लेकिन पिछले दिनों से जयंत चौधरी और अखिलेश के बीच इसे लेकर मतभेद हैं और इसीलिए जयंत अखिलेश ने मेरठ रैली के बाद से कहीं भी राजनीतिक मंच शेयर नहीं किया। इस बीच खबरें आ रहीं हैं कि भाजपा जयंत को वांछित सीटें देने को तैयार हैं। अगर ऐसा हो गया तो अखिलेश के राजनीतिक कुनबे को बड़ा झटका लगेगा। ज्ञात हो कि भाजपा की ओर से गठबंधन के लिए अधिकृत किए खुर्राट ब्राह्मण नेता लक्ष्मीकांत वाजपेई लम्बे समय से जयंत के साथ संपर्क में हैं।

उधर चाचा शिवपाल सिंह ने अखिलेश की पार्टी के साथ गठबंधन कर जरुर लिया है लेकिन अखिलेश की इच्छा के अनुरूप उन्होंने प्रसपा का समाजवादी पार्टी में विलय से इंकार कर दिया है। वे अखिलेश से पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए ‘ सम्मान’ भी चाहते हैं। लेकिन पार्टी के अंदर से खबरें हैं कि रामगोपाल यादव ने अखिलेश को साफ बोल दिया है कि किसी भी स्थिति में शिवपाल की पार्टी को 6 सीटों से ज्यादा नहीं देना चाहिए। याद रहे कि शिवपाल रामगोपाल से मतभेदों के चलते ही पार्टी और अखिलेश से अलग हुए थे। उधर भाजपा शिवपाल को गठबंधन की स्थिति में दर्जन भर सीटें देने को तैयार है‌। अगर ऐसा हो गया तो अखिलेश के कुनबे से शिवपाल की बगैर किसी निष्कर्ष के पुनः विदाई संभव है।

अखिलेश के राजनीतिक कुनबे के एक और अहम सदस्य ओमप्रकाश राजभर का भी भाजपा से पूरा मोहभंग नहीं हो पा रहा है। भाजपा एक बार फिर से ओमप्रकाश राजभर को अपने पाले में करने की कोशिश कर रही है। इसके लिए उत्तर प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेता दयाशंकर सिंह और ओमप्रकाश राजभर के बीच काफी बातचीत चल रही है। बीते शनिवार को भी दोनों नेताओं के बीच लंबी बातचीत हुई है। सूत्रों के मुताबिक पिछले 1 महीने में दोनों नेताओं के मध्य तीन बार मुलाकात हो चुकी है।

हालांकि ओमप्रकाश राजभर की ओर से लगातार भाजपा में लौटने की खबरें खारिज की जा रही है लेकिन उन्हें भी अखिलेश ने गठबंधन में सीटों के बारे में अधर में रखा है जिससे ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरुण राजभर नाराज़ हैं और एक बातचीत में उन्होंने दावा भी किया कि दयाशंकर सिंह से सीटों को ले बातचीत अंतिम दौर में है। चर्चा तो यहां तक है कि दयाशंकर सिंह सुभासपा यानी कि राजभर की पार्टी से चुनाव लड़ना चाहते हैं। बता दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में ओमप्रकाश राजभर भाजपा के साथ चुनावी मैदान में उतरे थे। पूर्वांचल में राजभर की अच्छी पकड़ है। ओमप्रकाश राजभर को योगी सरकार में मंत्री भी बनाया गया था। उनके वापस आने से पूर्वांचल में भाजपा को बहुत बड़ा फायदा हो सकता है।

अगर भाजपा की कोशिशें परवान चढ़ीं तो अखिलेश को मनोवैज्ञानिक रुप से बड़ा झटका लग सकता है। वैसे भी चुनाव आयोग ने जिस तरह डिजिटली चुनाव प्रबंधन किया है उससे अखिलेश सहित सभी पार्टियां स्तंभित हैं।

अखिलेश सहयोगी पार्टियों के लिए जिस तरह सीटें देने में आनाकानी कर रहे हैं उससे उनका छोटे दलों से गठजोड़ कर 2022 के उप्र के रण को जीतने की कोशिशें धूल-धुसरित हो सकतीं हैं। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि अखिलेश को सहयोगी दलों को सीटें देने में बड़ा दिल दिखाना होगा। वैसे भी ताऊ रामगोपाल और काका शिवपाल सिंह के बीच पटरी बिठाना अखिलेश के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।