October 23, 2026

पुलिस अभिरक्षा में मौत के मामले में सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया-

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पुलिस अभिरक्षा में मौत के मामले में सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने पुलिस कस्टडी में मौत के आरोपी मध्य प्रदेश के शहडोल में तैनात रहे पुलिस कांस्टेबल शेर अली की जमानत अर्जी खारिज कर दी है। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि पुलिस का दायित्व कानून व्यवस्था बनाए रखने का है। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस अभिरक्षा में मारपीट,टार्चर के बाद मौत सभ्य समाज के खिलाफ है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट भी ऐसी घटनाओं को लेकर नाराजगी जता चुका है। हाईकोर्ट ने कहा है कि ऐसे में अगर आरोपी की रिहाई की गई तो मुकदमे का ट्रायल प्रभावित हो सकता है। कोर्ट ने याची शेर अली को जमानत पर रिहा करने से इंकार कर दिया है। यह आदेश जस्टिस समित गोपाल ने शहडोल के पुलिस कांस्टेबल शेर अली की अर्जी पर दिया है। हालांकि शेर अली का अब एस आई के पद पर प्रमोशन हो चुका है।

इस विषय पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट राकेश पांडेय जी का कहना है कि पुलिस कस्टडी में सामान्य अपराध में गिरफ्तार लोगो के साथ किए जा रहे बर्बरतापूर्वक व्यवहार पर को फैसला माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा पारित हुआ है वह काफी फलदाई होगा क्योंकि कोर्ट का भी मानना है की जीवन का अधिकार सभी को है और इस प्रकार से अभिरक्षा में किसी को टॉर्चर करके मारना सीधे तौर पर हत्या करना है। पुलिस अभिरक्षा का मतलब ही है की संग्धित व्यक्ति को सुरक्षित रूप से न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना ताकि उसपर न्यायालय द्वारा आरोप सिद्ध कर सजा दिया जा सके।

 

गौरतलब है कि वाराणसी के संजय कुमार गुप्ता ने अदालत के आदेश से शहडोल पुलिस पर अपने पिता गोरखनाथ उर्फ ओम प्रकाश गुप्ता का अपहरण कर हत्या करने के आरोप में एफ आई आर दर्ज कराई थी। जिसमें दरोगा शंखधर द्विवेदी,शेर अली, दिग्विजय पांडेय,जगत सिंह,आर राजन, सुरेश प्रसाद अग्रवाल, महेश चंद्र अग्रवाल व कुमार गेस्ट हाउस में ठहरे एक अज्ञात व्यक्ति को आरोपी बनाया है। वाराणसी के लंका थाना में दर्ज प्राथमिकी में शहडोल पुलिस पर अपहरण कर हत्या करने का आरोप लगाया गया है। पुलिस पर आरोप है कि घर से मृतक को पकड़कर ले गयी। शिकायतकर्ता वाराणसी के थानों में पता लगाने को भटकता रहा। उसने एसएसपी से भी मामले में शिकायत की। लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।2 मार्च 1997 को फूलपुर पुलिस ने बताया कि शहडोल कोतवाली से सूचना आयी है कि ओम प्रकाश गुप्ता की मौत हो गई है। परिवार वाले शहडोल गये। पुलिस ने उन्हें शव वाराणसी नहीं लाने दिया। परिजनों को पुलिस ने धमकाया और शहडोल में ही अंतिम संस्कार करा दिया। वहां अखबारों में पुलिस अभिरक्षा में मौत की खबर छपी थी। वाराणसी आने पर पुलिस को जानकारी दी। लेकिन एफ आई आर दर्ज नहीं की गई तो कोर्ट की शरण ली। जांच पुलिस से हटाकर एस आई टी को सौंपी गई। जिसने 23अक्टूबर 98 को फाइनल रिपोर्ट पेश की। शिकायतकर्ता की आपत्ति पर सी जे एम वाराणसी ने पुलिस रिपोर्ट अस्वीकार करते हुए 5 जून 2007 को अभियुक्तों को सम्मन जारी किया। हाजिर न होने पर गैर जमानती वारंट भी जारी किया गया। आरोपी बचने के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहे।

शिकायतकर्ता का आरोप है कि कोतवाली में मौत के बाद अस्पताल ले जाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर चोटें बतायी गई है। जबकि याची का कहना था कि मृतक धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सीने में दर्द होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। याची अधिवक्ता ने हार्ट अटैक से नैसर्गिक मौत बताया। लेकिन कोर्ट ने याची अधिवक्ता की दलीलों को खारिज करते हुए जमानत अर्जी नामंजूर कर दी। इसी मामले में अभी अन्य आरोपियों ने भी जमानत अर्जी दाखिल की है। जिस अभी हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है।