September 20, 2026

क्या है MSP, जिसके लिए अड़े हैं किसान और इससे किसे फायदा होता है?

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दिल्ली बॉडर  (Delhi Border) पर पिछले तीन हफ्ते से ज़्यादा वक्त से किसान केंद्र सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन (Farmers Protesting Against New Acts) कर रहे हैं. वहीं, सरकार किसानों के साथ बातचीत करने की लगातार कोशिश कर रही है. इस पूरे गतिरोध में जो शब्द आप शब्द बार सुन रहे हैं, वो है एमएसपी (Minimum Support Price). मीडिया हो या सोशल मीडिया, हर जगह एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य शब्द सुनकर आ यह तो समझ गए हैं कि किसान इसके लिए गारंटी चाह रहे हें, लेकिन क्या आपको पता है कि यह वास्तव में है क्या (What is MSP) और इससे क्या फायदा किसे होता है?

यह फैक्ट शायद आपको पता हो कि वर्तमान में देश के पास सरप्लस अनाज भंडार है. डेटा की मानें तो भारत के पास 9.1 करोड़ टन अनाज भंडार है, जो देश की ज़रूरत से 250 फीसदी ज़्यादा स्टोरेज है. इसके पीछे की कहानी में एमएसपी की बड़ी भूमिका रही है, जिसे पंजाब और हरियाणा के किसानों को गेहूं और चावल उगान के बदले लाभकारी रिटर्न देने के मकसद से शुरू किया गया था और 70 व 80 के दशक में इसके बेहतरीन नतीजे मिलना शुरू हुए.

 

क्या होता है एमएसपी?
न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तव में वो कीमत है, जो साल में दो बार रबी और खरीफ की फसल के समय क्राॅप साइकल से पहले घोषित की जाती है. यानी सरकार गारंटी देती है कि किसानों को फसल का कम से कम मूल्य तो मिलेगा ही भले ही सरकार को फसल खरीदना पड़े. यह व्यवस्था कुछ बड़ी फसलों के लिए आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी द्वारा एक कमीशन की सिफारिश के बाद की गई थी.

 

MSP के तहत बुवाई से लेकर कृषि श्रम तक कई तरह की कीमतों को शामिल किया जाता है. वर्तमान में 23 प्रमुख फसलों के लिए यह व्यवस्था लागू है. इन फसलों में चावल, गेहूं, ज्वार, जौ, बाजरा, मक्का और रागी के साथ ही पांच किस्म की दालें, 8 तरह के तेल बीज, कच्चा कपास व जूट, खोपरा, गन्ना और वीएफसी तंबाकू शामिल हैं.

कितने किसानों को मिला है एमएसपी का फायदा?
खबरों में आप यह बार बार सुन रहे होंगे कि सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध प्रदर्शन करने दिल्ली पहुंचे हैं. इसकी वजह यही है कि इन दो राज्यों के किसानों की खुशहाली के अतीत में एमएसपी का बड़ा हाथ रहा है. यह भी एक फैक्ट है कि देश के सिर्फ पांच फीसदी किसानों को ही एमएसपी का फायदा मिलता है क्योंकि इस व्यवस्था की शुरूआत पंजाब और हरियाणा में गेहूं व चावल की पैदावार को बढ़ावा देने के मकसद से ही हुई थी.

 

ये पांच प्रतिशत किसान उन इलाकों से ताल्लुक रखते हैं, जाहं 1980 के दशक में हरित क्रांति का इतिहास रचा गया. यही वजह है कि ये किसान जिस सिस्टम से समृद्ध हुए हैं, उसके लिए खतरा नज़र आ रहे नए कानूनों का विरोध कर रहे हैं. दूसरी तरु, 95 फीसदी किसान वो हैं, जो इस सिस्टम के दाये में हैं ही नहीं. इसकी कई वजहें रही हैं. इन किसानों को एमएसपी सिस्टम न मिलने के पीछे जागरूकता की कमी, एमएसपी मंडियों को लेकर अरुचि और खेतों का अपर्याप्त आकार होना रहा है.

किन्हें नहीं मिलता यह लाभ?
एमएसपी के दायरे से बाहर वो किसान हैं, जिनके पास औसतन 2 हेक्टेयर से भी कम ज़मीन है या फिर जिनके पास कृषि भूमि है ही नहीं. हाशिये पर रहे इन किसानों की तादाद 86 फीसदी के करीब है. ये वो किसान हैं जो अपनी लागत के ठीक रिटर्न नहीं पाते. इसकी वजह यह है कि ये किसान न तो सरप्लस अनाज उगा पाते हैं और न ही इनके पास ट्रांसपोर्ट आदि के पर्याप्त साधन व इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं.

 

एक और पहलू यह है कि पंजाब और हरियाणा से केंद्र सरकार फूड सिक्योरिटी एक्ट के तहत चावल और गेहूं की फसल का भंडार जुटाती है, जिसे उत्तर प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों के गरीबों तक लोक वितरण प्रणाली के तहत 5 रुपये प्रति किलो के रियायती मूल्य पर पहुंचाया जाता है. इससे होता यह है कि इस स्कीम से सस्ता अनाज मिलने के कारण इन प्रदेशों के किसानों को फसल की सही और अच्छी कीमत नहीं मिल पाती.

 

कुल मिलाकर कुछ राज्यों में एमएसपी से किसान समृद्ध होते हैं, तो जिन असमृद्ध राज्यों में यह सिस्टम नहीं है, वहां के किसानों पर इस सिस्टम का बोझ पड़ता है. जानकार कहते हैं कि व्यवस्था में संतुलन और ‘सबके विकास’ की नीति अपनाए जाने की ज़रूरत बनी हुई है.

तो क्या है एमएसपी पर लड़ाई?
खास तौर से पंजाब और हरियाणा के किसानों को यह डर है कि नए कानूनों की आड़ में सरकार ने ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश की है, जिससे धीरे धीरे एमएसपी का सिस्टम खत्म हो जाएगा और कृषि व कृषि भूमियों पर पूंजीपतियों का सीधा दखल हो जाएगा. सरकार कह रही है कि एमएसपी को लेकर कोई खतरा नहीं है, लेकिन किसान नए कानूनों के दूरगामी नतीजों से डरे हुए हैं.

वास्तव में, कोविड और बीते दिनों हुए टिड्डियों के हमले के बाद किसानों को उम्मीद थी कि सरकार से अतिरिक्त मदद के तौर पर कुछ राहत मिलेगी, लेकिन नए कानूनों ने किसानों को और परेशान करने का काम किया. वहीं, जानकार कह रहे हैं कि केंद्र सरकार को हर क्षेत्र की समस्याओं को ध्यान में रखकर सबके हित में नीति बनाने की दिशा में पहल करना चाहिए.