विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है। – s.p. pandey

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भारतीय_शौच_व्यवस्था_एवं_वामकुक्षी 🙏🏻

सदियों से भारतीय ज्ञान एवं संस्कारों की एक महान परंपरा रही है. वेदों-पुराणों-ग्रन्थों सहित विभिन्न उत्सवों एवं सामान्य सी दिखाई देने वाली प्रक्रियाओं में भी हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रकृति के संतुलन का पूरा ध्यान रखा है.

जो परम्पराएं, रीति-रिवाज एवं खानपान से लेकर पहनावे तक जो भी ज्ञान ऋषि-मुनियों ने हमें विरासत में दिया है, वह न सिर्फ अदभुत है, बल्कि पूर्णतः तर्कसम्मत एवं वैज्ञानिक भी है. प्रस्तुत लेख में मैं सिर्फ तीन उदाहरण देना चाहूँगा.

हमारे बुज़ुर्ग हमेशा कहा करते हैं कि गर्भवती स्त्री को हमेशा सदविचार रखने चाहिए, सात्त्विक भोजन करना चाहिए और उससे हमेशा मृदु भाषा में ज्ञानपूर्ण बातचीत करनी चाहिए, ताकि होने वाली संतान भी तेजोमय एवं बुद्धिमान हो. इन बुजुर्गों को यह ज्ञान कहाँ से मिला?? क्या उन दिनों तथाकथित आधुनिक विज्ञान की पढ़ाई होती थी? फिर इन लोगों ने कैसे जान लिया कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण सुनने-समझने की क्षमता रखता है? हम सभी ने महाभारत की वह कथा पढ़ी है, जिसमें अर्जुन अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदन के गुप्त रहस्यों एवं पद्धति के बारे में विस्तार से बताते हैं. उस समय उनका पुत्र अभिमन्यु अपनी माता के गर्भ में था. यह बात हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई महाभारत में कही गई है कि “गर्भवती स्त्री के गर्भ में पल रहा भ्रूण एक निश्चित समय के पश्चात पूरी तरह सुनने-समझने और स्मरण रखने की शक्ति रखता है”. जब अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का रहस्य बताया उस समय सुभद्रा जाग रही थीं, लेकिन जब अर्जुन चक्रव्यूह तोड़कर बाहर निकलने की योजना बता रहे थे उस समय सुभद्रा सो गई थीं. इसीलिए अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो स्मरण था, परन्तु उससे बाहर निकलने की कला उन्हें ज्ञात नहीं थी.

अब ये वर्षों पुराना सिद्धांत पश्चिम के वैज्ञानिक हमें ही सिखा रहे हैं. वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि गर्भवती स्त्री का भ्रूण किस सीमा तक सुनने-समझने-सोचने की क्षमता रखता है. आधुनिक विज्ञान द्वारा हमें बताया जा रहा है कि यह एक नई खोज है. कितना हास्यास्पद है ना??

मित्रों आपने अपने बुजुर्गों से “वामकुक्षी” नामक शब्द के बारे में तो सुना ही होगा, बहुत पुराना शब्द है, पीढ़ियों से चला आ रहा है. “वाम” यानी बाँया और “कुक्षी” यानी करवट. वामकुक्षी का अर्थ है बाँई करवट लेटना. हमारे बुजुर्गों को उनके आयुर्वेद एवं अनुभव ज्ञान से इस बात की पूरी जानकारी थी कि मनुष्य को भोजन के पश्चात कुछ देर “वामकुक्षी” लेनी चाहिए, अर्थात बाँई करवट लेटना चाहिए, ताकि पाचन क्रिया दुरुस्त रहती है. जब बुजुर्गों को यह बात पता थी, तो स्वाभाविकतः इसका अर्थ यह भी होता है कि निश्चित हेए उन्हें इसके पीछे छिपे विज्ञान एवं शारीरिक संरचना की जानकारी भी होगी, अन्यथा वे दाँयी करवट लेटने को भी कह सकते थे… या यह भी कह सकते थे कि भोजन के पश्चात वज्रासन में बैठने की बजाय रस्सी कूदना चाहिए. अब पश्चिमी विज्ञान हमें बता रहा है कि बाँई करवट सोने से लीवर में स्थित “पाचक अम्ल” नीचे की तरफ होता है, जिससे भोजन अच्छे से पचता है और यह ह्रदय के लिए भी लाभकारी होता है. तात्पर्य यह कि भारतीयों को “वामकुक्षी” से मिलने वाले शारीरिक लाभों की पूरी जानकारी थी. कैसे थी? क्या यह विज्ञान नहीं था?? या फिर विज्ञान उसी को माना जाए, जो अंग्रेजी शब्दों में पश्चिम के गोरे हमें बताएँ??

तीसरा उदाहरण है भारतीय पद्धति की शौच व्यवस्था. जैसा कि हम सभी जानते हैं भारत में सदियों से उकडूँ बैठकर शौच करने की परंपरा रही है. यहाँ तक कि हमें बचपन से यह सिखाया जाता है कि नीचे बैठकर ही मूत्र त्याग करना चाहिए. महिलाएँ तो आज भी बैठकर ही मूत्र-त्याग करती हैं, लेकिन अधिकाँश पुरुषों ने पश्चिम की नक़ल एवं पैंट-शर्ट वाले पहनावे के कारण खड़े-खड़े मूत्र त्याग की पद्धति अपना ली है. परन्तु पुराने जमाने ने जब पुरुष भी धोती धारण करते थे, तब वे नीचे बैठकर ही मूत्र-त्याग करते थे. यही पद्धति हम शौच करते समय भी अपनाते आए हैं. जब से भारतीयों का खान-पान विकृत हुआ है और उनके घुटनों में दर्द रहने लगा है तब से महानगरीय एवं अर्ध-नगरीय भारतीय भी पश्चिम की देन अर्थात “कमोड” का उपयोग करने लगे हैं. आधुनिक(?) वैज्ञानिक जाँच से पता चला है कि यदि शौच करते समय मनुष्य के दोनों घुटने उसके पेडू (या कहें बड़ी आँत) से ऊपर रहें तो बड़ी आँत पर दबाव नहीं रहता तथा शौच खुलकर होता है. जबकि कमोड पर बैठकर शौच करने से बड़ी आँत थोड़ी सी वक्राकार हो जाती है जिससे मल पूरी तरह साफ़ नहीं हो पाता.

अब बताईये, क्या हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों एवं बुजुर्गों को इसका विज्ञान पता नहीं था?? उन्हें सब कुछ अपने अनुभव और ग्रंथों में लिखे ज्ञान के आधार पर पता था. यहाँ तक कि पर्यावरण और खेतों की उर्वरकता को बरकरार रखने के लिए पुराने जमाने में खेतों के किनारे शौच किया जाता था. अब यह संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अपने-अपने घरों में भारतीय पद्धति से शौच तो किया ही जा सकता है. जिन बुजुर्गों अथवा मरीजों को घुटने में समस्या है और वे नीचे नहीं बैठ सकते, उनके कमोड हेतु पश्चिमी देशों से एक नया आविष्कार आया है जिसे “Squatty Potty” का नाम दिया गया है, इसे कमोड के पास पैरों के नीचे रखें ताकि आपके घुटने पेट से ऊपर हो जाएँ. वास्तव में अब पश्चिमी देश भी समझ चुके हैं, कि शौच की भारतीय पद्धति सर्वोत्तम है, लेकिन वहाँ पर भारतीय पद्धति के शौचालय नहीं हैं, तो उन्होंने इसकी जुगाड़ के रूप में इस उपकरण को निकाला है. शौच के पश्चात हाथ राख या मिट्टी से धोने चाहिए, पैरों को पीछे से भी धोना चाहिए, शौच करते समय बात नहीं करनी चाहिए जैसे कई “वैज्ञानिक” नियम हमारे प्राचीन ज्ञान ग्रंथों में मौजूद हैं, लेकिन चूँकि आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी शिक्षा, वामपंथी विकृति तथा सेकुलरिज़्म नामक बीमारी के कारण हिन्दू संस्कृति को अक्सर हेय दृष्टि से देखने का फैशन चल पड़ा है.

विगत साठ वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था को वामपंथी एवं सेकुलर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने स्वार्थ एवं धर्म विरोधी मानसिकता के कारण इतना दूषित कर दिया है कि अधिकाँश लोगों को हमारे ग्रन्थ अथवा परम्पराएँ बेकार लगती हैं. जब भी पश्चिमी देश कोई शोध करके हमें बताते हैं तब यहाँ के “परजीवी” किस्म के बुद्धिजीवी उनकी जयजयकार में लग जाते हैं. जबकि वही बात सदियों पहले भारत के संत और आयुर्वेदिक चिकित्सक आदि हमें न सिर्फ लिखित में बता चुके थे बल्कि उन्होंने उन बातों को हमारे रोजमर्रा के जीवन में धर्म के साथ इतनी सुन्दर तरीके से पिरोया था कि अब वह हमें सामान्य सी बातें लगती हैं. इस पश्चिमी वैचारिक गुलामी और वैज्ञानिक आधार पर टिके हुए वृहद भारतीय ज्ञान एवं संस्कृति के सैकड़ों और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं…

हिंदू धर्म में हजारों सालों से संक्रमण से बचने के लिए कुछ सूत्र जो अब पूरी दुनिया अपना रही है-
घ्राणास्ये वाससाच्छाद्य मलमूत्रं त्यजेत् बुध:। (वाधूलस्मृति 9)
नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठित:। (मनुस्मृति 4/49))
नाक, मुंह तथा सिर को ढ़ककर, मौन रहकर मल मूत्र का त्याग करना चाहिए।
तथा न अन्यधृतं धार्यम् (महाभारत अनु.104/86)
दुसरों के पहने कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
स्नानाचारविहीनस्य सर्वा:स्यु: निष्फला: क्रिया: (वाधूलस्मृति 69)
स्नान और शुद्ध आचार के बिना सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं, अतः: सभी कार्य स्नान करके शुद्ध होकर करने चाहिए।
लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं तैलं तथैव च। लेह्यं पेयं च विविधं हस्तदत्तं न भक्षयेत्।
(धर्मसिंधु 3 पू.आह्निक)
नमक, घी, तैल, कोई भी व्यंजन, चाटने योग्य एवं पेय पदार्थ यदि हाथ से परोसे गए हों तो न खायें, चम्मच आदि से परोसने पर ही ग्राह्य हैं।
न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं वसनं बिभृयात्। (विष्णुस्मृति 64)
पहने हुए वस्त्र को बिना धोए पुनः न पहनें। पहना हुआ वस्त्र धोकर ही पुनः पहनें।
न चैव आर्द्राणि वासांसि नित्यं सेवेत मानव:। (महाभारत अनु.104/52)
न आर्द्रं परिदधीत (गोभिलगृह्यसूत्र 3/5/24)
गीले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।
चिताधूमसेवने सर्वे वर्णा: स्नानम् आचरेयु:। वमने श्मश्रुकर्मणि कृते च (विष्णुस्मृति 22)
श्मशान में जाने पर, वमन होने/करने पर, हजामत बनवाने पर स्नान करके शुद्ध होना चाहिए।
हस्तपादे मुखे चैव पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्। (पद्मपुराण सृष्टि 51/88)
नाप्रक्षालित पाणिपादौ भुञ्जीत। (सु.चि.24/98)
हाथ, पैर और मुंह धोकर भोजन करना चाहिए।
अपमृज्यान्न च स्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभि:। (मार्कण्डेय पुराण 34/52)
स्नान करने के बाद अपने हाथों से या स्नान के समय पहने भीगे कपड़ों से शरीर को नहीं पोंछना चाहिए, अर्थात् किसी सूखे कपड़े (तौलिए) से ही पोंछना चाहिए।
न वार्यञ्जलिना पिबेत्। ( मनुस्मृति 4/63)
नाञ्जलिपुटेनाप: पिबेत्। (सु.चि.24/98)
अंजलि से जल नहीं पीना चाहिए, किसी पात्र(गिलास) से जल पीयें।
न धारयेत् परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन। (पद्मपुराण सृष्टि 51/86)
दुसरों के स्नान के वस्त्र (तौलिए इत्यादि) प्रयोग में न लें।

अब देख लीजिएआधुनिक अस्पताल और मेडिकल साइंस धराशाई हो चुके हैं और समस्त विश्व हजारों साल पुराने बचाव के उपाय अपना रहा है।🌸🚩

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