January 21, 2022

राजनेता, मंत्री के गिरेबान पर हाथ बहुत देर में पहुंचता है।

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राजनेता, मंत्री के गिरेबान पर हाथ बहुत देर में पहुंचता है। ज्यादातर तो पहुंचता ही नहीं। क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई होते हैं सत्ता से बाहर रहे यह भीतर। इनके काम नहीं रुकते। लोकतंत्र के नाम पर नूरा कुश्ती का ढोंग पाखण्ड चलता रहता है। दरअसल, इस संसदीय लोकतंत्र के “ढोंग पाखण्ड” पर कभी कुछ लिखा ही नहीं जाता। ना कभी इस को जन विमर्श में लाया गया। यही वजह है, इस ढोंग पाखण्ड पर राजनीतिक सामाजिक चेतना का स्तर बहुत निम्न है।
यह पोस्ट लिखने की खास वजह है, इस तंत्र में अब तक का अतीत खंगालिए। और देखिए, करप्शन, घोटालों में कितने अफसर जेल गए, तुलना में मंत्रियों या राजनेताओं के।
सुखराम मामले में आईएएस रुनु घोष का जिक्र किया था। जेल के बाद उनका क्या हश्र हुआ, किसी ने सुध नहीं ली।
इस घटना के बाद मेरे एक मित्र ने भारतीय संचार सेवा से इस्तीफा देकर निजी क्षेत्र में कदम रख लिया। वो कानपुर आईआईटी के प्रोडक्ट थे, इंडीयन इंजीनियरिंग सर्विस (IES) में चुने गए। फिर वीएसएनएल में “ज्वाइंट डिप्टी डायरेक्टर जनरल (प्लानिंग एन्ड स्ट्रेटजी) बने। इस पद को छोड़ा, 36 साल की उम्र में।
इस्तीफा देने से पहले मित्र ने कहा, “सुमन्त भाई! किसी दिन मेरा हाल भी रुनु घोष की तरह होगा, समय रहते निकल लिया जाए।” एक और बात खतरनाक कही थी, हमारी संचार प्रणाली पूरी तरह चीन की दी टेक्नोलॉजी पर खड़ी की जा रही है, कल हम चीन के गुलाम होंगे।”
मुझे याद आता है, राजस्थान के एक IAS अफसर का वाकया। वदुन्धरा के दौरे में सताए हुए। बहुत बुरी हालत में नोएडा के एक अस्पताल में मिले। गिड़गिड़ा रहे थे। एक कारोबारी के जमीन घोटाले में वसुंधरा जी के “टूल” बनें। घोटाला बेनकाब हुआ तो वसुंधरा जी छिटक कर अलग हो गईं। अफसर जी गिरफ्तार हुए। बीमार पड़े। आज ना जाने किस हाल में हैं।।
ऐसा हमेशा होता है। मंत्री के साथ माल काटते अफसर को भी यह मालूम होता है, कल पहला नम्बर मेरा, मंत्री जी तो बाद में। मुलायम सिंह जी वक्त अखंड प्रताप सिंह हों या अखिलेश के समय बी चन्द्रकला। ये सभी अपने “राजनीतिक आकाओं” को ही “अंतिम सत्य” या “अंतिम सत्ता” मान बैठे। शिवानी भटनागर केस में क्या हुआ ? नाम आया प्रमोद महाजन का ऒर जेल गए रविकांत श्रीवास्तव।
बंगाल में जारी राजीव कुमार भी ऐसा ही एक मसला है। हालात स्पष्ट बता रहे हैं, ममता बनर्जी के लिए “संविधान की शुचिता” महज एक “राजनीतिक नारा” है। खेल तो कुछ और है। ममता जी, अधिकारी को नहीं, खुद को बचा रही हैं।
नहीं तो, राज्य के सर्वोच्च संवेधानिक पद पर बैठी महिला को यह संघर्ष सड़क पर नहीं, सुप्रीम कोर्ट में करना चाहिए था। तभी संविधान की गरिमा स्थापित होती। लेकिन ममता जी का “यहकदम” तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।
लब्बोलुआब यह है, राजनेताओं ने ब्यूरोक्रेसी को दूषित किया। घर की चेरी बनाया। और लालच, धन, सत्ता के दम्भ ने एक ब्यूरोक्रेट को बनाया “अपराधी” । कमोबेश यही खेल मीडिया में भी जारी है।
यह संक्रमण का दौर में है। सरदार पटेल ने ब्यूरोक्रेसी के ढांचे को “आयरन फ्रेम” कहा था। पर अफसोस, इस आयरन फ्रेम में जंग लग चुका है।
और सबसे बड़ा घातक संकेत, आज यह आयरन फ्रेम योग्य युवाओं के लिए आकर्षण नहीं रहा। मानविकी के छात्र भले ब्यूरोक्रेसी में रहने को मजबूर हो, पर मेरे ऐसे जितने भी तकनीकी शिक्षा से आए मित्र हैं, वो ब्यूरोक्रेसी छोड़ निजी क्षेत्रों या विदेश अध्ययन को निकल चुके हैं।
एक सामान्य नागरिक को मीडिया या ब्यूरोक्रेसी को बाहर से देख आकर्षण हो सकता है। लेकिन अंदर बैठे उन आकर्षक चेहरों की सच्चाई बहुत भयावह है। यह घुटन बहुत सीलन और कुंठा भरी है। एक ऐसी सीलन, जो जीवन को अर्थहीन कर देती है।
खैर, मुद्दा बंगाल है। यह तो तय है, राजीव जेल जाते हैं तो मुझे खुशी होगी, कसूरवार पाए जाने पर कल ममता, मुकुल राय, बाबुल सुप्रियो, शाहरुख खान, श्रीमती चिदंबरम भो जेल जाएं।

*यदि आप श्रेष्ठ राजनेता नहीं देंगे तो यकीन मानिए, आपको श्रेष्ठ अधिकारी या श्रेष्ठ पत्रकार, श्रेष्ठ चिकित्सक, श्रेष्ठ शिक्षक भी नहीं मिलेंगे।*

*यही वजह है, सत्ता के इस संशोधन युग में अपन मोदी का समर्थन करते हैं। क्योंकि मोदी ने, अकल्पनीय, अस्पर्शनीय सत्ता परिवारों के गिरेबान में हाथ डालने का अदम्य साहस किया।*
यकीनन यह संसदीय लोकतंत्र का “नूरा कुश्ती” युग का समापन है।

*एक जिम्मेदार नागरिक, एक दायित्ववान पिता होने के नाते मेरा पूर्ण समर्थन नरेंद्र मोदी