May 25, 2022

मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी न करे पुलिस : हाईकोर्ट-

Spread the love

*मुकदमा दर्ज होते ही गिरफ्तारी न करे पुलिस : हाईकोर्टl

 

 

*इलाहाबाद* हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि जब तक पुलिस अधिकारी इस बात से संतुष्ट नहीं होते कि किसी मामले के आरोपी की गिरफ्तारी आवश्यक है, तब तक उसकी गिरफ्तारी न की जाए।कोर्ट ने कहा कि पुलिस मुकदमा दर्ज होते ही आरोपी की रुटीन तरीके से गिरफ्तारी न करे। किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी तभी की जाए, जब मामला सीआरपीसी की धारा 411 के मानकों पर खरा उतरता हो।

 

कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पूर्व उसकी गिरफ्तारी को लेकर एक चेक लिस्ट तैयार करें जिसमें गिरफ्तारी के कारण का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाए।पुलिस अधिकारी को यह स्पष्ट रूप से बताना होगा कि मामले में अभियुक्त की गिरफ्तारी क्यों जरूरी है। साथ ही मजिस्ट्रेट पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट का अवलोकन करें और उस पर अपनी संतुष्टि दर्ज करने के बाद ही गिरफ्तारी का आदेश आगे बढ़ाएं।

 

यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ केजे ठाकर एवं न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की खंडपीठ ने एटा के विमल कुमार व तीन अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। कोर्ट ने यह आदेश सात साल से कम सजा वाले अपराधों में लगातार की जा रही गिरफ्तारियों को देखते हुए दिया है। साथ ही डीजीपी को इस आदेश का जिम्मेदारी के साथ अनुपालन कराने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि हमें यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि सात साल से कम सजा या अधिकतम सात वर्ष कैद के मामलों में गिरफ्तारी के खिलाफ लगातार याचिकाएं दाखिल हो रही हैं। जबकि सीआरपीसी की धारा 41ए के प्रावधान इसीलिए लाए गए हैं कि जो लोग गंभीर अपराध के आरोपी नहीं हैं और जिनकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है उन्हें गिरफ्तारी का सामना न करना पड़े। लेकिन अफसोस है कि यह प्रावधान अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रहा है।

 

कोर्ट ने कहा कि मुकदमा दर्ज होने के दो सप्ताह के भीतर अभियुक्त को सीआरपीसी की धारा 411 के तहत नोटिस प्राप्त कराया जाए। यह अवधि जिले के पुलिस अधीक्षक द्वारा कारण दर्ज करते हुए बढ़ाई भी जा सकती है । कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी इन निर्देशों का सभी मुकदमों की विवेचना में पालन करेंगे। कोर्ट ने कहा कि हम पुलिस अधिकारियों का ध्यान सुप्रीम कोर्ट के एक्शन फोरम फॉर मानव अधिकार आनंद तिवारी और अमरेश कुमार केस में दिए निर्देशों की ओर दिलाना चाहते हैं जिनमें सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता व सामाजिक न्याय के बीच संतुलन कायम करें। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अब भी सात वर्ष से कम सजा वाले मुकदमों में आरोपियों की रुटीन तरीके से गिरफ्तारी कर रही है, जो सीआरपीसी के संशोधित प्रावधानों के विपरीत है।

 

मामले के तथ्यों के अनुसार विमल कुमार के खिलाफ एटा कोतवाली में दहेज उत्पीड़न व दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया। उस पर आरोप है कि शादी तय होने के बाद वर पक्ष की ओर से दहेज में क्रेटा कार की मांग की गई और कार न देने पर शादी तोड़ देने की धमकी दी गई जबकि याची का कहना था की वधू पक्ष ने सगाई के बाद उस पर पैसे देने के लिए दबाव बनाया और कहा कि यदि पैसा नहीं दिया जाता है तो उसे फर्जी मुकदमे में फंसा दिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विवेचना जारी है और याची यदि अधीनस्थ अदालत में जमानत या अग्रिम जमानत अर्जी दाखिल करता है तो पीठासीन अधिकारी उस पर नियमानुसार निर्णय लें।