October 21, 2021

*पूर्वांचल के विकास में रोड़ा बनी राजनैतिक पार्टियाँ*

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वाराणसी। पूर्वांचल राज्य की मांग को लेकर पीएम के संसदीय क्षेत्र लहुराबीर स्थित आजाद पार्क में आमरण अनशन किया जा रहा है लेकिन शासन-प्रशासन का उपेक्षात्मक रवैया कई प्रश्न खड़ा करता दिख रहा है। विधानसभा चुनावों से पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 नवंबर 2016 की गाजीपुर रैली में पटेल आयोग की सिफारिशों पर अमल करने का पूर्वांचल की जनता से वादा तो किया लेकिन वे भूल गए हैं। ऐसा नहीं है कि पूर्वांचल राज्य की मांग पहली बार उठी हो। वर्ष 1962 में ही गाजीपुर के तत्कालीन सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के सामने संसद में पूर्वांचल की बदहाली गरीबी और भुखमरी की दास्तां सुनाई तो नेहरू रो पड़े और उसी समय केंद्र सरकार ने पटेल आयोग का गठन किया जिसने पूर्वांचल को बदहाली से बाहर निकालने के लिए पूर्वांचल राज्य के गठन की रिपॉर्ट प्रस्तुत की थी। परंतु पटेल आयोग की रिपोर्ट आज तक केंद्रीय गृह मंत्रालय में धूल फांक रही है। 1990 के दशक में पूर्व राज्यपाल मधुकर दिघे ने गोरखपुर और वाराणसी से कई सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के साथ मिलकर पृथक पूर्वांचल राज्य आंदोलन की कमान सम्हाली लेकिन यह आंदोलन भी मात्र बैठकों तक ही सीमित होकर रह गया। स्व. कल्पनाथ रॉय और वर्तमान में प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ भी पूर्वांचल राज्य के गठन की पैरवी करते रहे हैं। छोटे राज्यों के गठन को लेकर सियासी पार्टियों का अपना अलग-अलग नजरिया हो सकता है लेकिन देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल राज्य के गठन को लेकर मांग तेज हो गई है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अलग पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग तेज होने लगी थी और पूर्वांचल के विकास को सियासी मुद्दा बनाया गया था। एक बार फिर पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग को लेकर पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र से मांग तेज हो गयी है। कहने को तो भाजपा और बसपा सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन अलग राज्य के गठन की पक्षधर है वहीं समाजवादी पार्टी नहीं चाहती कि अलग राज्य का गठन हो। पूर्वांचल के प्रमुख मुद्दों में बुनियादी सुविधाओं की कमी ग्रामीण शिक्षा और रोजगार, कानून-व्यवस्था प्रमुख चिंता का कारण है। भाजपा इस इलाके को लेकर खासा गंभीर रही है। लेकिन सरकार के दावों के बावजूद यह क्षेत्र विकास से कोसों दूर है। कई सरकारें आई और चली गईं लेकिन पूर्वांचल का पिछड़ापन जस का तस रहा। अलग पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग लंबे समय से होती रही है लेकिन संगठित रूप से लड़ाई नहीं हो पाने के कारण पूर्वांचल का मुद्दा हमेशा नेपथ्य में चला गया। वर्ष 1982-83 में विजय दुबे ने इस आंदोलन को पूर्वांचल मुक्ति मोर्चा के बैनर तले शुरू किया। उस दौरान लोग इस आंदोलन से जुड़े लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव जो पूर्वांचल राज्य के विरोधी रहे येन-केन प्रकाणेनऔर आंदोलन से जुड़े लोगों को अलग करते रहे। छोटे-छोटे समूहों में बंटे होने के कारण पूर्वांचल के बंटवारे का कोई बड़ा मुद्दा नहीं उठ सका। राजनीतिक दलों ने विकास के नाम पर पूर्वांचल के साथ केवल धोखा किया। किसी भी पार्टी ने विकास के बारे में सोचा ही नहीं। यही कारण है कि आज पूर्वांचल की गिनती देश के पिछड़े इलाके के रूप में होती है। पूर्वांचल के विकास की उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गोरखपुर की खाद फैक्ट्री से लेकर कई चीनी मिलें बंद हो गईं। आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बनारस के बुनकर बदहाली के कगार पर आ गए। भदोही के कालीन उद्योग पर बुरा प्रभाव पड़ा। बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में पलायन करने लगे। आज भी देश की आर्थिक नगरी मुंबई में पूर्वांचल के लोगों का कब्जा है। यह सब इसलिए कि पूर्वांचल के विकास को लेकर कभी किसी सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाया। केंद्रीय योजनाओं के तहत बुनकरों के लिए विशेष पैकेज की घोषणा की गई। प्रदेश सरकार ने बंद पड़ी चीनी मिलों को खोलने की पहल की। लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ। आज पूर्वांचल के किसान से लेकर बुनकर तक हताशा, कर्ज, बीमारी की चपेट में आ गए हैं। जब-जब राज्यों के बंटवारे की बात हुई तो बसपा प्रमुख मायावती ने कहा कि अलग राज्य बनाया जाना चाहिए लेकिन समाजवादी पार्टी ने विरोध किया। वहीं भाजपा ने भी छोटे राज्यों का समर्थन किया ताकि विकास के लिए किए जा रहे वायदे पूरे किए जा सकें। परन्तु केन्द्र व प्रदेश दोनों ही जगह भाजपा का राज होने के बाद भी पूर्वांचल राज्य का गठन न होना अत्यंत ही दुःखद है। सितम्बर 2013 में अनुज राही हिंदुस्तानी की अगुवाई में एक गैर राजनैतिक संगठन ने पूर्वांचल राज्य जनान्दोलन की नींव रखी और जून 2016 तक पूर्वांचल राज्य हेतु चिन्हित 28 जिलों में पूर्वांचल राज्य की मांग हेतु जनसमर्थन व भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु दौरे और बैठकों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का एक सार्थक प्रयास शुरू किया। 20 सितम्बर 2015 को वाराणसी में एक कॉन्फ्रेंस कर पूर्वांचल के समस्त जिलों से पूर्वांचल राज्य के समर्थक सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने इसमे अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। पूर्वांचल राज्य जनान्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक अनुज राही हिंदुस्तानी ने 5 जून 2016 को वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर 15 दिन का जल सत्याग्रह किया गया लेकिन तत्कालीन सपा सरकार के निर्देश पर सत्याग्रहियों को हिरासत में ले लिया गया। पूर्वांचल राज्य गठन के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से 28 जिलों में क्रमिक रेल रोको आंदोलन भी हुआ। वाराणसी के कैंट रेलवे स्टेशन से शुरू हुआ रेल रोको आंदोलन पूरे वर्ष चलता रहा। पूर्वांचल राज्य जनांदोलन को अहिंसक तरीके से निर्णायक जंग तक पहुंचाने के दृष्टिकोण से अक्टूबर 2016 में अनुज राही हिंदुस्तानी के नेतृत्व में वन्दना रघुवंशी, राजेश पांडेय, भूपेंद्र सिंह और हरबंश पटेल गाजीपुर में 72 घण्टे के अनशन पर बैठ गये। परन्तु तत्कालीन सपा सरकार ने 24 घण्टे बाद अनशनकारियों को हिरासत में लेकर अनशन को समाप्त करा दिया। बावजूद इसके पूर्वांचल राज्य की मांग करने वाले आंदोलनकारियों का मनोबल नहीं टूटा बल्कि वह बढ़ता गया तथा दिसम्बर 2017 में वाराणसी के शास्त्री घाट पर 120 घण्टे के अनशन की शुरुआत हुई। मांगें पूरी न होने पर आंदोलन को आगे बढ़ा दिया गया। आंदोलनकारियों के 127 घण्टे पूर्ण होने पर शासन के प्रतिनिधि के रूप में तत्कालीन एडीएम सिटी और एस.पी.सिटी ने आश्वासन के साथ आंदोलन समाप्त कराया कि सरकार आपके साथ है और आंदोलन की अगली तिथि निर्धारित कर शासन को सूचित करें। इस बीच पूर्वांचल राज्य गठन की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए 14 मार्च 2018 को पीएम मोदी की सभा में प्रदर्शन करने की तैयारी कर रहे संगठन के 10 महिला एवं 5 पुरुष कार्यकर्ताओं को देर रात तक विभिन्न थानों पर पाबंद कर लिया गया। 14 मार्च को शहंशाहपुर में पीएम की सभा में प्रदर्शन के मामले में वन्दना रघुवंशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। पूर्वांचल राज्य आंदोलन के प्रति प्रशासन के दमनकारी रवैये के खिलाफ अप्रैल में अनुज राही हिंदुस्तानी एवं वन्दना रघुवंशी तत्कालीन जिलाधिकारी के स्थानांतरण की मांग को लेकर अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठ गए लगभग दस दिन बाद सरकार की तरफ से कार्यवाही का आश्वासन देकर अनशन समाप्त करा दिया गया। इस दौरान पूर्वांचल राज्य की मांग करने वाले आंदोलनकारियों ने शासन/प्रशासन को अवगत करा दिया कि यदि पूर्वांचल राज्य का गठन नहीं होता है तो 15 अगस्त से संगठन निर्णायक जंग लड़ने के लिए तैयार है। पूर्व निर्धारित घोषणा के तहत 15 अगस्त को आंदोलन प्रारम्भ होने से पूर्व ही पूर्वांचल राज्य आंदोलन के संयोजक अनुज राही हिंदुस्तानी को गिरफ्तार कर चेतगंज पुलिस ने जेल भेज दिया। जेल भेजे जाने के बाद अनुज राही ने जेल में ही अनशन शुरू कर दिया वहीं दूसरी ओर लहुराबीर आजाद पार्क में केंद्रीय सुरक्षा बलों की चौकसी के बीच वन्दना रघुवंशी का अनशन 31 अगस्त तक चलता रहा। 31 अगस्त को देर रात्रि अनशनकारियों की हालत खराब होने पर प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। बावजूद इसके उनका अनशन अस्पताल में भी जारी रहा।

*शासन-प्रशासन की भूमिका संदिग्ध*

पूर्वांचल राज्य जनांदोलन के सत्याग्रहियों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहाकि शासन-प्रशासन ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी हैं। उनका कहना था कि लगातार शासन/प्रशासन को सूचित करने के बाद भी प्रशासन द्वारा अनशन स्थल (आजाद पार्क) में टेंट लागाये जाने से रोक दिया गया। जिसके चलते आंदोलनरत सत्याग्रहियों को धूप और बारिश में रहने को विवश होना पड़ रहा है। पूर्वांचल राज्य गठन की पैरवी करने वाली बसपा सुप्रीमों द्वारा अपनी पार्टी का समर्थन न दिया जाना यह दर्शाता है कि बसपा के लोग मात्र अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए पूर्वांचल राज्य की मांग करती है। कांग्रेस पार्टी जो इन दिनों पूर्वांचल ही नहीं पूरे प्रदेश में अपनी जमीन तलाशने का काम कर रही है उसके प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर द्वारा अनशनकारियों के मध्य पहुंच कर पार्टी द्वारा समर्थन दिए जाने का लिखित रूप से पत्र सौंपा है और कहा कि कांग्रेस पार्टी पूर्वांचल राज्य गठन का समर्थन करती है। वहीं प्रदेश की सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया द्वारा विधानसभा चुनाव से पूर्व पूर्वांचल राज्य गठन की आवाज उठाना और सत्ता में आने के बाद पूर्वांचल राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों की उपेक्षा करना ये दर्शाता है कि भाजपा की कथनी और करनी में काफी विरोधाभास है।