October 20, 2021

धड़क का ” झिंगाट “गाना नहीं देखा तो क्या देखा

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मैं ‘शोले’ का प्रशंसक रहा हूं. फिर मैंने ‘राम गोपाल वर्मा की आग’ देख ली. जो कुछ भी मेरी भावनाओं के साथ हुआ, मैंने बर्दाश्त कर लिया. ऐसा ही कुछ-कुछ ‘ज़ंजीर’ के साथ भी हुआ. अब लग रहा है कि बदलते वक़्त के साथ मेरे सब्र की सीमा सिकुड़ती जा रही है. अब और ज़्यादा सदमा झेलने की ताकत नहीं रही. इसी वजह से मैं उस फिल्म को देखने का इरादा त्याग रहा हूं, जिसका कभी मुझे बेसब्री से इंतज़ार था. मैंने ‘धड़क’ का ‘झिंगाट’ गाना देख लिया. अब मेरी फिल्म देखने की ख्वाहिश मर गई है.

जब ‘धड़क’ का ट्रेलर आया था, उसे देखकर लगभग हर कोई निराश था. तब हमारे एडिटर ने एक बात बोली थी. उन्होंने कहा था कि हमें प्यूरिटन एप्रोच नहीं रखनी चाहिए. माने शुद्धतावादी रवैया. किसी भी चीज़ को पूर्वाग्रह के साथ नहीं देखना चाहिए. उनकी बात को सम्मान देते हुए मैंने बिल्कुल खुले दिमाग से ‘झिंगाट’ देखना चाहा. फिर से निराशा ही हाथ लगी. मज़े की बात ये कि इस बार खुद एडिटर साहब भी निराश हैं.

‘झिंगाट’ का ‘धड़क’ वर्जन कई सारी वजहों से आपको मायूस करता है. इस तथ्य के बावजूद कि ओरिजिनल धुन से, म्युज़िक से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. जैसे कि अजय-अतुल के ही मशहूर मराठी गाने ‘कोंबडी पळाली’ को ‘चिकनी चमेली’ में बदलते वक़्त की गई थी. संगीत वैसा का वैसा रखा गया है. बावजूद इसके वो फील आ ही नहीं पा रहा.

ओरिजिनल ‘झिंगाट’ की सबसे बड़ी ख़ासियत थी, उसका प्रॉपर कोरियोग्राफ्ड़ नहीं होना. ऐसा लगता था जैसे बस गाना बजाके छोड़ दिया हो और लोगों से कहा हो, नाचो… पूरा गाना ऐसा ही है. नीचे गांववाले, परश्या, उसके दोस्त और छतपर आर्ची फुल मस्ती में जैसा मन करे वैसा नाच रहे हैं. कोई स्टेप नहीं, कोई सिंक्रोनाइज़ेशन नहीं. बस प्योर डांस. ‘धड़क’ वाले में इस बेपरवाई का न होना ही सबसे बड़ी दिक्कत है. बहुत मेहनत से इसमें स्टेप्स दिए गए हैं जो गाने की मूल भावना का क़त्ल कर देते हैं. भले ही फिर उन्हें बेहद आकर्षक तरीके से फिल्माने की कोशिश की गई हो.

इसकी दूसरी बड़ी दिक्कत इसका फ्लैशी होना है. फ्लैशी मतलब चमकदार, भड़कीला, रंग-बिरंगा. बड़ी सी हवेलीनुमा इमारत, चमकीली लाइट्स, डिज़ाइनर कपड़े ये सब नकली सा लगता है. अगर क्लीशे लाइन में ही बोला जाए तो मूल गाने की आत्मा मिसिंग सी लगती है. ईशान खट्टर तो फिर भी परश्या के आसपास पहुंचने की कोशिश करते नज़र आते हैं लेकिन जाह्नवी के बारे में ये कतई नहीं कहा जा सकता. रिंकू राजगुरु की निभाई आर्ची के व्यक्तित्व में एक सम्मोहित करने वाला एरोगेंस था. वो जाह्नवी में बिल्कुल नहीं दिखाई देता. हालांकि ऐसी किसी तुलना की ज़रूरत नहीं है फिर भी ‘सैराट’ से भावनात्मक जुड़ाव ये सब चीज़ें नोट करता ही है.

बिरयानी कैसी बनी होगी इसका अंदाज़ा कुछेक चावल के दाने चख लेने भर से पता चला जाता है. ये गाना ‘धड़क’ के लिए वही दर्जा रखता है. इसे देखकर अंदाज़ा हो जाता है कि ‘सैराट’ फैन्स पर ये फिल्म कितना ज़ुल्म करने वाली है. मेरी तो फिल्म देखने की इच्छा ही मर गई. अफ़सोस!