January 20, 2021

कमलनाथ का बेहतर विकल्प बन सकते हैं ये नेता पुत्र?

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मध्यप्रदेश : कमलनाथ यदि राजनीति से संन्यास लेते हैं तो क्या मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेतृत्व विहीन हो जाएगी? पंद्रह साल बाद राज्य की सत्ता में कांग्रेस की वापसी कमलनाथ (Kamalnath) के नेतृत्व में ही हुई थी, लेकिन कमलनाथ सरकार पंद्रह माह भी ठीक से नहीं चल सकी. ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का अपने समर्थक विधायकों के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो जाने के कारण विधानसभा में कमलनाथ की सरकार अल्पमत में आ गई. सरकार गिर जाने के बाद कमलनाथ पर संतुलन बनाकर सरकार न चला पाने के आरोप दबी जुबां से कांग्रेसी लगा रहे हैं. अहमद पटेल (Ahmed Patel) के निधन के बाद कांग्रेस की केन्द्रीय राजनीति में भी उनका समर्थन करने वाला नेता नहीं है.

कमलनाथ की जुबां पर आखिर क्यों आई राजनीति छोड़ने की बात

कमलनाथ ने अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाड़ा में राजनीति छोड़ने की इच्छा जाहिर की. उन्होंने रविवार को छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में आयोजित कांग्रेस के एक कार्यक्रम में कहा कि जिले की जनता और कार्यकर्ताओं से उनके सदैव पारिवारिक संबंध रहे हैं. इस आधार पर यदि सब चाहते हैं कि अब मैं आराम करूं तो मैं रिटायर्ड होने के लिए तैयार हूं. इस पर प्रतिक्रिया में सब लोगों ने खड़े होकर कहा कि आपको आराम नहीं काम करना है और फिर से सरकार बनाना है. अपने रिटायरमेन्ट के सवाल पर कमलनाथ कहते हैं- जिले की जनता ने मुझे सब कुछ दिया है, जिसकी वजह से ही आज मैं इस मुकाम पर हूं, जिस दिन जनता कहेगी उस दिन मैं राजनीति से संन्यास ले लूंगा. उल्लेखनीय है कि 28 सीटों के विधानसभा उपचुनाव के नतीजों के बाद से मध्य प्रदेश में कांग्रेस के भीतर ही भीतर असंतोष पनप रहा है. नेतृत्व परिवर्तन की मांग भी इक्का-दुक्का नेता उठा रहे हैं. कमलनाथ वर्तमान में मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के साथ-साथ कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रतिपक्ष हैं.

कमलनाथ-दिग्विजय सिंह में भी बढ़ रही हैं दूरियां?
कमलनाथ के नेतृत्व पर सबसे ज्यादा सवाल दिग्विजय सिंह समर्थकों की ओर से ही खड़े किए जा रहे हैं. श्योपुर जिले के विधायक बाबूलाल जंडेल ने कहा कि यदि उपचुनाव में दिग्विजय सिंह को आगे रखा जाता तो कांग्रेस की पराजय न होती. राज्य में जिन 28 सीटों पर उपचुनाव के नतीजे पिछले माह आए हैं,उनमें कांग्रेस को सिर्फ नौ सीटें ही मिल पाई हैं. जबकि जिन सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें 27 सीटें आम चुनाव में कांग्रेस ने जीती थीं. इन सीटों से जीते विधायकों ने ही मार्च में विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफा देने वाले विधायकों का आरोप था कि कमलनाथ की आड में सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं. दिग्विजय सिंह और कमलनाथ रणनीति के तहत ज्योतिरादित्य सिंधिया को नुकसान पहुंचनाने में लगे हैं.

2018 में हुए विधानसभा के आम चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया था. दिग्विजय सिंह के चेहरे को पर्दे के पीछे रखा गया था. राज्य में सरकार बनने के बाद सिंधिया को हासिए पर डाल दिया गया. उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष भी नहीं बनने दिया गया. नतीजा वे अपने समर्थक विधायकों के साथ भाजपा में चले गए.

चार दशक में भी मध्य प्रदेश में नहीं उभर सका युवा नेतृत्व
मार्च में सत्ता हाथ से निकल जाने के बाद भी कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के साथ-साथ विधायक दल के नेता भी बने रहे. जबकि दिग्विजय सिंह समर्थक डॉ.गोविंद सिंह को प्रतिपक्ष का नेता बनाए जाने का दबाव भी उन पर था. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी कमलनाथ के मामले में दखल नहीं दिया. मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हितेष वाजपेयी कहते हैं कि कमलनाथ पद से चिपके रहना चाहते हैं. जबकि उनकी स्वीकार्यता ही नेताओं के बीच नहीं है. कमलनाथ ने 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से लोकसभा का चुनाव लड़ा था. अपवाद स्वरूप एक बार को छोड़कर वे लगातार यहां से चुनाव भी जीतते रहे, लेकिन वे मध्यप्रदेश की राजनीति में मैदानी स्तर पर सक्रिय नहीं रहे. दिल्ली में अपने प्रभाव का उपयोग कर समर्थकों को टिकट अथवा महत्वपूर्ण पद दिलाते रहे.

कमलनाथ की पूरी राजनीति अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह का समर्थन कर चलती रही. माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनका विरोध रहा है. दिग्विजय सिंह- कमलनाथ के कारण राज्य में नया नेतृत्व भी उभरकर सामने नहीं आ पाया है.

कमलनाथ का विकल्प बन पाएंगे अजय, अरुण, जीतू या जयवर्द्धन सिंह

कमलनाथ के विकल्प के तौर पर एक ही नाम हमेशा सामने आता है. यह नाम पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का है, लेकिन उनकी बहुसंख्यक विरोधी छवि के कारण पार्टी नेतृत्व सौंपने से झिझकती है. दूसरा नाम अजय सिंह का है और वे पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र हैं. परंपरागत निर्वाचन क्षेत्र चुरहट से चुनाव हारने के बाद हासिए पर हैं. कमलनाथ से भी इनकी दूरी दिखाई देती है. पूर्व उपमुख्यमंत्री स्वर्गीय सुभाष यादव के पुत्र अरुण यादव को पार्टी एक बार पांच साल अध्यक्ष बनाकर देख चुकी है, लेकिन वे अपने आपको स्थापित नहीं कर पाए. नई पीढ़ी में दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह को नेतृत्व दिए जाने की मांग यदाकदा उठती रहती है. कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं. नकुल नाथ छिंदवाड़ा से सांसद हैं. कमलनाथ की तरह उनका चेहरा भी कोई खास लोकप्रिय नहीं है.

राहुल गांधी की टीम मेंबर के तौर पर जीतू पटवारी का नाम भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के लिए चर्चा में रहता है. पटवारी युवक कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. इस कारण उनका नेटवर्क भी है और वे पंद्रह महीने की सरकार में मंत्री भी रहे हैं.

अनुसूचित जाति और आदिवासी चेहरे का भी विकल्प है
कमलनाथ की चिंता अपने पुत्र नकुल नाथ की राजनीति की है. उपचुनाव के प्रचार में नकुल नाथ ही कमलनाथ के साथ हर महत्वपूर्ण जगह मौजूद थे. दिल्ली की राजनीतिक स्थितियां भी कमलनाथ के अनकुल दिखाई नहीं दे रही हैं. राहुल गांधी से उनकी दूरी अभी भी बनी हुई है. कमलनाथ खुद आगे आकर पार्टी अध्यक्ष अथवा विधायक दल की जिम्मेदारी नहीं छोड़ना चाह रहे हैं. नकुल नाथ के स्थापित होने से पहले कमलनाथ राजनीति छोड़ेगें, यह संभव दिखाई नहीं देता है. कमलनाथ के मीडिया प्रभारी नरेन्द्र सलूजा कहते हैं कि कमलनाथ कुर्सी की राजनीति नहीं करते वे सेवा करने मध्य प्रदेश में आए हैं. वर्तमान राजनीतिक हालतों को देखा जाए तो यह तय है कि दो में से कोई एक पद कमलनाथ को छोड़ना होगा. कमलनाथ विधायक दल के नेता का पद छोड़ सकते हैं. इस पद के लिए उनकी ओर से विजयलक्ष्मी साधौ का नाम आगे बढ़ाया गया है. साधौ अनुसूचित जाति वर्ग से हैं.आदिवासी वर्ग से बाला बच्चन का नाम भी विकल्प के तौर पर दिया गया है.